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शून्य के पार: Beyond the Void

शून्य के पार: Beyond the Void
$16.00
Item Code: NZA630
Author: ओशो (Osho)
Publisher: OSHO Media International
Language: Hindi
Edition: 2012
ISBN: 9788172612696
Pages: 104
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch

 

पुस्तक के विषय में

 

न तो ज्ञान ले जाएगा, न भक्ति ले जाएगी, न कर्म ले जाएगा । ज्ञान, भक्ति, कर्म तीनों मन के ही खेल हैं ।

इन तीनो के पार जो जाएगा-वही अ-मन, नो-माइंड, वही आत्मा, वही परम सत्य उसकी अनुभूति में ले जाता है । तब मुझसे मत पूछें कि मार्ग क्या है? सब मार्ग मन के हैं । मार्ग छोड़े, क्योंकि मन छोड़ना है । कर्म छोड़े, वह मन की बाहरी परिधि है । विचार छोड़े, वह मन की बीच की परिधि है । भाव छोड़े, वह मन की आखिरी परिधि है । तीनों परिधियों को एक साथ छोड़े । और उसे जान लें, जो तीनों के पार है, दि बियांड । वह जो सदा पीछे खड़ा है, पार खड़ा है, उसे जानते ही वह सब मिल जाता है, जो मिलने योग्य है । उसे जानते ही वह सब जान लिया जाता है, जो जानने योग्य है । उसे मिलने के बाद, मिलने को कुछ शेष नहीं रह जाता । उसे पाने के बाद, पाने को कुछ शेष नहीं रह जाता ।

ओशो पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु

धर्म का कोई मार्ग नहीं है, कोई पंथ नहीं है

ज्ञान मार्ग नहीं है, ज्ञान एक भटकन है

भक्ति भगवान का स्वप्न-सृजन

क्या है शुभ और क्या है अशुभ?

प्रवेश से पूर्व

 

मनुष्य को खंडों में तोड़ना और फिर किसी एक खंड से सत्य को जानने की कोशिश करना, अखंड सत्य को जानने का द्वार नहीं बन सकता है । अखंड को जानना हो तो अखंड मनुष्य ही जान सकता है ।

न तो कर्म से जाना जा सकता है, क्योकि कर्म मनुष्य का एक खंड है । न शान से जाना जा सकता है, क्योंकि शान भी मनुष्य का एक खंड है । और न भाव से जाना जा सकता है, भक्ति से, क्योंकि वह भी मनुष्य का एक खंड है ।

अखंड से जाना जा सकता है । और ध्यान रहे, इन तीनों को जोड़ कर अखंड नही बनता । इन तीनों को छोड़ कर जो शेष रह जाता है, वह अखंड है । जोड़ से कभी अखंड नहीं बनता । जोड़ में खंड मौजूद ही रहते हैं ।

बुद्धि को, भाव को, कर्म को जोड्ने के भी प्रयास किए गए है- कि इन तीनों को हम जोड़ लें, लेकिन इन तीनो को जोड़ कर जो बनता है, वह अखंड नहीं है । क्योंकि जो जोड़ कर बनता है, वह अखंड हो ही नहीं सकता । उसमे खंड मौजूद रहेंगे ही । जुड़े हुए होगे, लेकिन मौजूद होंगे । अखंड तो खंडों से मुक्त होकर ही मिलता है । ट्रांसेडेंस से मिलता है, अतिक्रमण से मिलता है । जब हम खंडों के ऊपर उठ जाते हैं, तब मिलता है ।

अखंड जोड़ नहीं है, अखंड खंड से मुक्त हो जाना है ।

मनुष्य का मन खंडन की प्रक्रिया है । मनुष्य का जो मन है, वह चीजों को खंड-खंड करके देखता है । जैसे आपने सूरज की किरण देखी है, सूरज की किरण अगर कांच के, प्रिज्म के टुकड़े में से निकाली जाए तो खंड-खंड हो जाती है । सात टुकड़ों में टूट जाती है । सात रंग पैदा हो जाते हैं । सूरज की किरण सिर्फ शुभ्र है । शुभ्र कोई रंग नहीं है । शुभ्र कोई रंग नहीं है! जब प्रिज्म से किरण टूटती है, तब सात रंग दिखाई पड़ने शुरू होते हैं ।

बुद्धि का जो प्रिज्म है, बुद्धि का जो टुकड़ा है, बुद्धि का जो देखने का ढंग है वह चीजों को तोड़ कर देखने का ढंग है । बुद्धि सदा तोड़ कर ही देख सकती है । बुद्धि कभी इकट्ठे को नहीं देख सकती । बुद्धि सदा खंड को देख सकती है । अखंड को नहीं देख सकती ।

तो बुद्धि जीवन के सत्य को कई खंडों में तोड़ देती है । वे खंड बुद्धि के द्वारा तोड़े गए है और ऐसे ही झूठ हैं, जैसे पानी में हम लकड़ी को डाल दें और लकड़ी तिरछी दिखाई पड़ने लगे । तिरछी हो नहीं जाती, सिर्फ दिखाई पड़ती है। बाहर निकाल लें पानी के, वह फिर सीधी हो जाती है । सीधी हो नहीं जाती, सीधी थी ही । सिर्फ वह तिरछा दिखाई पड़ना, जो पानी की वजह से पैदा होता था, माध्यम की वजह से पैदा होता था, वह विदा हो जाता है । पानी में डाल दें, फिर वह लकड़ी तिरछी दिखाई पड़ने लगती है ।

क्या लकड़ी पानी के भीतर तिरछी हो जाती है, अगर आप अपना हाथ डाल कर लकड़ी को देखें पानी के भीतर तो भी पता चलेगा कि वह तिरछी नहीं हुई । लेकिन हाथ भी तिरछा मालूम पड़ने लगेगा । पानी के माध्यम में सभी चीजें तिरछी हो जाती हैं, दिखाई पड़ने लगती हैं ।

बुद्धि के माध्यम में सभी चीजें टूट जाती हैं, टुकड़ों में हो जाती हें । और बुद्धि के तीन टुकड़े है । विचार है, भाव है, कर्म है । इसलिए बुद्धि जब भी देखेगी तो तोड़ कर देखेगी । फिर बुद्धि एक काम और भी कर सकती है कि इन तीनों को जोड़ ले, लेकिन वह जोड़ भी अखंड नहीं होगा । बुद्धि का जोड़ एकदम भ्रांत होगा । बुद्धि जोड़ सकती है ऊपर से, लेकिन खंड फिर भी मौजूद रह जाएंगे । जिन्हें जोड़ेगे हम, वे मौजूद रहेंगे । जुड़े हुए भी मौजूद रहेंगे । अखंड सत्य को जानना हो तो मन को पार करना जरूरी है । और उसे पार करने के लिए कर्म भी सहयोगी नहीं है, भाव भी सहयोगी नहीं है, ज्ञान भी सहयोगी नहीं है ।

अखंड को जानने के लिए मुझे भी अखंड ही खड़ा होना पड़ेगा, क्योंकि मैं वही जान सकता हूं जो मैं हूं । मैं उसे नहीं जान सकता, जो मैं नहीं हूं ।

अनुक्रम

1

कर्म, ज्ञान, भक्ति मन के खेल

01

2

ज्ञान, मार्ग नहीं, भटकन है

23

3

भक्ति भगवान का स्वप्न-सृजन

47

4

कर्म सबसे बड़ा भ्रम

69

ओशो एक परिचय

89

ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट

90

ओशो का हिंदी साहित्य

92

अधिक जानकारी के लिए

97

 

 

 

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