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आकाशवाणी एवं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत: Indian Classical Music and Radio

आकाशवाणी एवं हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत: Indian Classical Music and Radio
$24.80$31.00  [ 20% off ]
Item Code: NZJ955
Author: डॉ. शुचिस्मिता (Dr. Shuchismita)
Publisher: Kanishka Publishers
Language: Hindi
Edition: 2014
ISBN: 8173918368
Pages: 154
Cover: Hardcover
Other Details: 9.0 inch X 6.0 inch

पुस्तक परिचय

बीसवीं सदी ज्यों -ज्यों आगे बढ़ रही थी त्यों- त्यों पूरे विश्व में वैज्ञानिक प्रगति , राजनैतिक उथल - पुथल और विश्वयुद्धों की भूमिका रची जा रही थी | भारतीय परिवेश में शास्त्रीय संगीत राजाश्रय से वंचित हुआ और एक नए आलम्बन की तलाश में था | ऐसे में ही तीसरे -चौथे दशक तक आते-आते पं. विष्णु-दिगम्बर और श्री भातखण्डे के अथक प्रयासों में फलस्वरूप जहां संगीत का प्रचलन बढ़ा वहीं भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक सशक्त प्रसार -माध्यम भी मिला |

यह सहयात्रा लगभग आठ दशक पुरानी है | सम्बन्धो में कई तरह के परिवर्तन आए | कभी हारमोनियम तक से घबराने वाली आकाशवाणी अब 'ऑक्टोपैड' के इस्तेमाल से भी चिन्तित नहीं है | इन्ही सम्बन्धो पर एक पारखी नज़र डालती ये पुस्तक कई अनुतरित प्रश्नों के उत्तर आपको दे देगी | भविष्य के लिए कुछ सूत्र भी आपके हाथ लगेंगे |

लेखक परिचय

एक शिक्षक परिवार में जन्मी, बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न , इस पुस्तक की लेखिका डॉ. शुचिस्मिता वर्तमान में संगीत एवं नृत्य विभाग , कुरक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में रीडर के पद पर कार्यरत है | इसी विश्विद्यालय से एस.ए. (स्वर्ण पदक) , एम . फिल. एवं डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर आप गत 20 वर्षो से अध्यापन कार्य में संलग्न है | संगीत के क्रिया -पक्ष एवं शास्त्र -पक्ष दोनों ही में आपकी रूचि है | सन् 1985 ई. में आपकी पहली पुस्तक 'हरियाणा में शास्त्रीय संगीत और लोकसंगीत : परिस्थिति एवं संभावनाएँ' शीर्षक से प्रकाशित हुई | समय समय पर आपके संगीत सम्बन्धी लेख विभिन्न राष्ट्रीय स्तरीय पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे है | आकाशवाणी रोहतक से आपके सुगम-संगीत के कार्यक्रम भी प्रसारित होते रहे है | बाल्यकाल से ही पिता प्रोफेसर गुरुलाल नारंग और माता सन्तोष नारंग से मिली भक्ति -भाव को सहेजते हुए भजन -गायन की ओर आपका विशेष लगाव रहा है | अपने सहृदय, कलाप्रेमी , व्यवसाय से इंजीनियर पति श्री करण शर्मा की प्रेरणा से साईं -भजनों का एक कैसेट सन् 1992 ई. में 'मधुरम साईं मधुरम ' के नाम से बंगलौर से रिकार्ड हुआ व साईं-भक्तो में विशेष रूप से लोकप्रिय हुआ |





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