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Books > Hindu > हिन्दी > भारतीय आचार्यो का भाषा चिंतन: The Linguistic Thought of Indian Acharyas
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भारतीय आचार्यो का भाषा चिंतन: The Linguistic Thought of Indian Acharyas
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भारतीय आचार्यो का भाषा चिंतन: The Linguistic Thought of Indian Acharyas
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Description

पुस्तक के विषय में

अनादि काल से ही भारत में भाषा-चिन्तन की अजल धारा मनीषियों के मानस को सिञ्चित और पल्लवित होती रही है । वैयाकरण । नैयायिक, मीमांसक, काव्यशास्त्र के मर्मज्ञ सभी तो इस भाषा सरिता के पावन जल में मञ्जन कर चुके हैं ।

प्रस्तुत ग्रन्थ में दिल्ली विश्वविद्यालय तथा अन्य प्रख्यात विद्वानों-आचार्य देवेन्द्र नाथ शर्मा, श्री मणिनाथ झा, डा० कृष्ण लग्न, डा० भोलानाथ तिवारी, डा० पुष्पेन्द्र कुमार, डा० कुमारी अरुणा गुप्ता, डा० रघुनाथ पाण्डेय, डा० सूर्यकान्त बाली, डा० रघुवीर वेदालंकार, डा० ब्रह्ममित्र अवस्थी, डा० बलि राम शुक् न, डा० ओम प्रकाश सिंहल, डाट आर० एस० सैनी, डा० रामगोपाल मिश्र, श्री वेद प्रकाश शास्त्री, श्री रमण कुमार शर्मा, श्री जगदीश प्रसाद मिश्र आदि - ने भतृहरि और आधुनिक भाषा चिन्तन; अथर्ववेद में भाषा संबंधी विचार; शिक्षा और प्रतिशाख्य, यास्क का भाषापरक चिन्तन, आचार्य व्याडि का भाषा चिन्तन बौद्ध संस्कृत भाषा- चिंतन प्रक्रिया; काशिकाकार का भाषा विषयक योगदान, संस्कृत भाषा और व्याकरण को भट्टोजि दीक्षित का योगदान; भरत का निर्वचन चिन्तन; भट्ट मीमांसक मत में वाक्यार्थ बोध; आचार्य कुमुदेन्दु का भूवलय में भाषा चिन्तन; आचार्य शौनक का भाषा चिन्तन आदि अन्य अनेक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं ।

About the Author

Dr.Pushpendra Kumar (14.7.36); Reader Sanskrit Deptt. South Delhi Campus, University of Delhi, Delhi; First class First and Gold-Medalist in M.A. (Sanskrit) 1958, Ph.D. 1967; selected by the Govt. of India for Higher Studies as Commonwealth Scholar, studied at the School of Oriental and African Studies, London University; Fellow of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland, 1971; visited various European countries. namely England, France, Italy, W. Germany. Austria, Holland & Switzerland for study purposes, started his career in 1959 as University Lecturer and was engaged inPost- Graduate teaching in the University of Delhi; Principal of Shri Lal Bahadur Shastri Kendriya Sanskrit Vidvapeetha. New Delhi; Reader in the Deptt. of Sanskrit South Delhi Campus Delhi University, Delhi 1977; associated with the editing of many research journals; published ten books and twenty five research articles: chief Investigatoil- Major U. G. C. Research project. a Descriptive Catalogue of Sanskrit Inscriptions.

 

Published Books

Sakti Cult in Ancient India (1974); Devi Puran, (1976); M.M.P.N.S. Memorial Vol. 1974; Yogratnamala (Tantric Text with Eng. Trans.) 1980; Aesthetics and Sanskrit litera- ture, 1980. Treatment of Pathos in Sanskrit, Drama 1981, Goddesses in Indian Buddhism, Mahabhagvata Puran 1983. Linguistic Thought in Ancint India 1984.

प्राक्कथन

विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ पर विश्व के क्षितिज पर सर्वप्रथम भाषा का दिव्य प्रकाश फैला था और उसने सारी मानवजाति को चकाचौंध कर दिया । 'इयं या परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्मसशिता' अथर्व० । इस भाषा के चमत्कार ने मानवीय संवेदनाओं को दूसरे तक पहुंचाने का एक सुगम एवं सरल उपाय प्रस्तुत किया । 'अयश्गीयस्त्वाच्च शब्देन संज्ञाकरणं व्यवहारार्थ लोके' निरुक्त । फिर प्रारम्भ हुआ सर्वतोमुखी चिन्तन । कभी अर्थरिक्त विचार हुए, कभी पदविभाजन पर विचार हुए । निर्वचनों के व्याकरणागत संस्कार पर आचार्यों ने अपने अपने मन्तव्य प्रस्तुत किये । वेदों से प्रारम्भ कर आधुनिक युग तक भारतीय मनीषी भाषा की गहन परतों को उद्घाटित करने में लगे हुए है । विशेषता भारत की यह रही है कि जब सारा विश्व अज्ञान के अन्धकार में विलीन था उस समय हमारे ऋषि एवं आचार्य भाषा के विभिन्न पहलुओं पर चिन्तन प्रारम्भ कर चुके थे । आधुनिक युग में तो पश्चिम के विद्वान् भी अथक परिश्रम एवं लगन से इस वाग्देवी की उपासना में संलग्न हैं । यह वाग्देवी भी अपने उपासकों को ज्ञान की झलक देकर उनको पुरस्कृत करती रहती है तथा उनके द्वारा किये गये शोध कार्यो द्वारा मानव हृदय की गहराइयों को समझने में हम काफी सक्षम हो रहे एं । यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ 'अन्तिमेत्थम्' रूप से कुछ भी नही कहा जा सकता है ।

भाषा ही वह इकाई है जिसने मानव जाति को एक सूत्र में पिरो कर रखा हुआ है

(यजुर्वेद २६ । २)

एक भाषा बोलने वाले लोग अपने को अधिक निकट का अनुभव करते हैं 'Linguistic affinity is the strongest' यह विश्व के सभी लोग एकमत होकर स्वीकार करते है । इसी प्रकार भारतीय धरातल को जिसमें विभिन्न धर्म को मानने वाले, अनेक नृवंशों से सम्बन्ध रखने वाले तथा विभिन्न भूभागों से आने वाले गर्व समाज निवास करते है उनको एक सूत्र में बाँधने का काम संस्कृत भाषा ने किया है।दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में हिमालय की ऊचाइयों तक, 'आसेतुहिमालयात्' सभी जगह संस्कृत ने अपनी गहरी जड़ें फैला रखी हैं । उसी संस्कृत भाषा के आचार्यों ने भाषा के क्षेत्र में समय-समय पर जो चिन्तन प्रस्तुत किये हैं उनका एक मूल्यांकन यथासम्भव एवं यथाशक्ति प्रस्तुत किया जा सके, इस विचार से संस्कृतपरिषद्, दक्षिण परिसर, दिल्ली विश्वविद्यालय मे एक द्विदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया-'भारतीय आचार्यो का भाषा- चिन्तन ।' इस विषय पर लगभग एक सौ से अधिक विद्वानो ने इसमें भाग लिया तथा संगोष्ठी को सफल किया । उस संगोष्ठी के विचार-विनिमय का निष्कर्ष आपके समक्ष पुस्तक रूप में प्रस्तुत है ।

वेद भाषा की प्राचीनतम उपलब्ध कृति होने के कारण वेदों को ज्ञान का भण्डार स्वीकार किया गया है । अत: शब्द ब्रह्म का चिन्तन वैदिक काल से ही प्रारम्भ हो गया था । वेदो के प्रसिद्ध विद्वान् सर्वश्री वेदप्रकाश शास्त्री ने 'वेद में भाषातत्व' नामक प्रस्तुत निबन्ध में अपने विचार व्यक्त किये हैं । वाणी के चार रूप-परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी आदि का संकेत ऋग्वेद में उपलब्ध है ।

'चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।

गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति । ऋग्वेद १ । १६५।४५

अन्तर, वर्ष, विभ्रनरक्तियां, उपसर्ग, क्रियायें, नाम, विशेषण, समास, सन्धियां, छन्द, प्रत्यय, वाक्यरचना और अलंकार आदि सभी तो वेदों में उपलब्ध हैं । प्रोफेसर कृष्णलाल ने अथर्ववेद में भाषा सम्बन्धी विचार पर अपना लेख लिखा है । अथर्ववेद में गौ शब्द वाणी के लिये प्रयुक्त हुआ है । अथर्ववेद में भाषा को विराट् कहा गया है । वैश्वनरी कहा है अर्थात् वह लोगों में व्याप्त है-सब को ले जाने वाली है । वह परमेष्ठिनी अर्थात् सर्वोच्च पद पर अधिष्ठित है । भाषा सबको ज्ञानरूपी दूध का पान कराने वाली माता है ।

प्रोफेसर भोलानाथ तिवारी ने प्रातिशाख्यों और शिक्षाग्रन्थों में भाषा के मूल तत्व अर्थात् ध्वनियों पर विचार विमर्श प्रस्तुत किया है । यह ध्वनि विचार उस काल का है जब विश्व में कहीं भी भारत के अतिरिक्त इतना गम्भीर विवेचन नहीं हो रहा था । तदनन्तर डा० पुष्पेन्द्र कुमार ने विश्व के प्रथम भाषा वैज्ञानिक आचार्य यास्क के भाषापरक विचारो पर निबन्ध प्रस्तुत किया है । यास्क ने अपनी बहुमूल्य देन-'नामानि आख्यातजानि'अर्थात् नाम आख्यतज हैं-कह कर भाषा विज्ञान की सुखद नींव रख दी थी । यास्क ने चार प्रकार के शब्द समूह, उपसर्गों का स्वतन्त्र अस्तित्व, शब्दों की अर्थवत्ता तथा नित्यता, एवं निर्वचन के सिद्धान्तो का निर्देशन करके एक महत्वपूर्ण पद्धति का विकास किया था । परवर्त्ती आचार्य यास्क के महत्व को तथा उनके योगदान को सदैव स्मरण रखेंगे ।

आचार्य व्याडि का 'संग्रह' ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता परन्तु व्याडि के नाम से कुछ विचार अन्य ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं । उन्हीं को आधार बनाकर कु० अरुणा गुप्ता ने व्याडि के भाषा परक चिन्तन को प्रस्तुत किया है । डा० रघुनाथ पाण्डेय ने बौद्धों की भाषा चिन्तन प्रक्रिया को बड़े ही विद्वत्ता- पूर्ण लेख में प्रस्तुत किया है ।

प्रोफेसर मणिनाथ झा ने कुछ विशिष्ट शब्द प्रयोगों को अपना विचार- बिन्दु बनाकर प्राचीन आचार्यो के भाषापरक चिन्तन को विद्वानों के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया है । श्रीरमण कुमार शर्मा द्वारा लिखित निबन्ध में 'भाषा चिन्तन में प्रतिभा की अवधारणा-भारत के विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रतिपादित प्रतिभा-सिद्धान्त' पर विचार व्यक्त किये हैं । यह एक ऐसा सिद्धान्त हे जिस पर बहुत से आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में विचार व्यक्त किये हैं । डा० रधुवीर वेदालंकार 'काशिका' के एक विशिष्ट विद्वान् हैं । उन्होने काशिकाकार द्वारा निबद्ध भाषा परक चिन्तन को हमारे सामने रखा है । उसी प्रकार डा० सूर्यकान्त बाली ने बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से परवर्त्ती वैयाकरण भट्टोजिदीक्षित का संस्कृत भाषा को योगदान' लेख में भट्टोजिदीक्षित के एक नये स्वरूप को उद्घाटित किया है । परवर्त्ती काल के आचार्यो में आचार्य भट्टोजिदीक्षित ने अपना एक विशिष्ट स्थान बना रखा है तथा पाणिनि को छोड़ कर सभी आचार्यों को उन्होंने पीछे छोड़ दिया है । वे भाषा परक चिन्तन के क्षेत्र में सदा ही स्मरणीय रहेंगे ।

आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा उस संगोष्ठी के प्रथम तथा प्रमुख वक्ता थे । उन्होँने अपने वैदुष्यपूर्ण लेख में भर्त्तृहरि के महत्व को आधुनिक भाषा विज्ञान के सन्दर्भ में पूर्णरूप से उद्घाटित किया है । आचार्य भर्त हरि ने भाषा-चिंतन को एक दर्शन शास्त्र का पद प्रदान किया है । उन्होंने शब्द की व्यापकता पर दृष्टि डालते दृष्टि-शब्द को ब्रह्म ही स्वीकार किया है ।

'अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्व यदक्षरम् ।'आचार्य भर्तृ' हरि एक क्रान्तिकारी भाषा वैज्ञानिक के रूप में याद किवे जाते रहेंगे । उनकी वाक्यपदीय भाषाचिन्तन के क्षेत्र में नये मानदण्ड स्थापित करने में एक अक्षय कोष का काम कर रही है । जितनी गहराई तक आचार्य भर्तृ हरि पहुंच गये थे उतनी गहराई तक शायद ही कोई पश्चिम का विद्वान् पहुँचा हो । डा० कंवर लाल ने आचार्य शौनक द्वारा प्रतिपादित भाषा सिद्धान्तों का विवेचन किया है । भारतीय व्याकरण शास्त्र में 'स्फोटवाद' की बड़ी चर्चा रही है । इस विषय पर शोधपूर्ण निबन्ध लिख रहे हैं श्रीरमण कुमार शमा । इन्होने बड़े ही परिश्रम से 'स्फोट' को बड़े ही सुन्दर शब्दों में समझाने का प्रयत्न किया है ।

डा० रामगोपाल मिश्र ने नाट्यशास्त्र के रचयिता आचार्य भरत का निर्वचन-चिन्तन प्रस्तुत करके काव्यशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में एक नयी चिन्तन दिशा प्रस्तुत की है । डा० ब्रह्ममित्र अवस्थी ने 'भाट्ट मीमांसक के मत में वाक्यार्थबोध' की प्रकिया पर विद्वत्तापूर्ण लेख लिखा है तथा इस गुत्थी को सुलझाने में बड़ा ही परिश्रम किया है । डा० बलराम शुक्ल ने ''शब्दार्थ- सम्बन्धे अन्विताभिधानवादिन' इस लेख में वाक्यार्थ बोध के दूसरे पक्ष को उद्घाटित किया है । डा० जगदीश प्रसाद मिश्र ने 'आशाधर भट्ट एवं संकेत- ग्रह' पर विचारों को अभिव्यक्त किया है । डा० रणजीत सिंह सैनी ने आचार्य कुमुदेन्दु द्वारा रचित भूवलय ग्रन्थ को आधार बनाकर लेख लिखा है । आचार्य कुमुदेन्दु कुछ क्रान्ति करना चाहते थे और इसी विचार से उन्होंने 'भूवलय में संख्या को आधार वनाकर भाषा को समझने के सूत्र प्रदान किये हैं । यह एक नयी दिशा दी आचार्य कुमुदेन्दु ने । आधुनिक युग में शैली-विज्ञान नाम से भाषा संरचनात्मक स्वरूप पर विचार किया जा रहा है । प्राचीन आचार्यों ने सम्भवत: इसी को रीतियों में परिगणित किया था । इस आधुनिकतम विषय पर लिख रहे हैं डा० ओमप्रकाश सिंहल । ये शैली विज्ञान का भारतीय काव्य शास्त्र के साथ क्या सम्बन्ध हो सकता है, इस विषय पर उनके विचार पठनीय हैं ।

भाषाचिन्तन के क्षेत्र में इन निबन्धों का एक अपना महत्व है । भाषा की गुत्थियों को समझने में ये निबन्ध काफी सीमा तक सहायक हो सकेंगे ऐसा हमारा विश्वास है । यह तो प्रारम्भिक प्रयास है--आशा है इस दिशा में एक सर्वतोमुखी प्रयत्न का यह एक शुभारम्भ है । मैं उन सभी विद्वानों का जिन्होंने निबन्ध लिखकर दिये हैं तथा कठिन विषयों पर अपनी लेखनीउठाई है-हृदय से आभारी हूं । जिन विद्वान् वक्ताओं ने अपने अपने विचार मौलिक रूप से व्यक्त किये उन सभी का धन्यवाद है । प्राचीन आचार्यो के प्रति जिन्होंने उस प्राचीन काल में दिशा-निर्देश कर दिये थे-परन्तु हम जिन्हें भूल बैठे थे-शब्दों में कृतज्ञता ज्ञापन सम्भव नही-यही कहा जा सकता है कि इस प्रयास के माध्यम से हम उनके प्रयासो एवं प्रयत्नों को आगे बढ़ाकर अपनी श्रद्धा के सुमन अर्पित करते हैं ।

मैं अपने सहयोगियों डा० कृष्ण लाल, डा० योगेश्वरदत्त शर्मा, डा० रणजीत सिंह सैनी, डा० दीप्ति त्रिपाठी, डा० श्रवण कुमार सिन्हा, डा० महावीर, डा० सत्यपाल नारंग एवं अन्य सभी के साक्रिय सहयोग एवं हार्दिक समर्थन के लिए हृदय से कृतज्ञ हूँ । बिना जिनके सहयोग के यह प्रयास असम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य था । इस ज्ञान यज्ञ की सफलता काश्रेय मेरे सभी सहयोगी बन्धुओं को है । दक्षिण परिसर के उन कर्मचारी बन्धुओं के प्रति मैं नतमस्तक हूं जिन्होंने निष्कामभाव से नेपथ्य में रह कर इस ज्ञान गंगा को प्रवाहित करने में अपने भगीरथ प्रयत्न एवं सहायता सदैव सहर्ष प्रदान की ।

अन्त में मैं मैसर्स नाग पब्लिशर्स के अध्यक्ष श्री नागशरण सिंह, तथा उनके सुपुत्र श्री नरेन्द्र प्रताप तथा श्री सुरेन्द्र प्रताप का हृदय से आभारी हूं । मेरे एक निवेदन पर ही इस ज्ञानयज्ञ में अपनी सहायता प्रदान करने को तत्पर हो जाते है । इस पुस्तक को सुन्दर रूप मे प्रस्तुत करने का श्रेय सभी इन महानुभावो को है ।

अन्त मे मैं सुधी जनों से क्षमा प्रार्थना करता हृ कि इस प्रयास में जो त्रुटि रह गई हो उनको नजर अन्दाज करते हुये मेरे इस प्रयास मे अपना सम्बल प्रदान करके मेरा उत्साहसंवर्धन करेंगे। यजुर्वेद के वाक्य के साथ अपने निवेदन को पूर्ण करता हूं । यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य:

 

 

विषय-सूची

 

प्राक्कथन

 

1

वेद में भाषा-तत्व

1

2

अथर्ववेद मैं भाषा-सम्बन्धी विचार

11

3

शिक्षा और प्रातिशाख्य में भाषा-चिंतन

19

4

आचार्य व्याडि का भाषा-चिन्तन

25

5

यास्क का भाषा-परक चिन्तन

35

6

भर्तृहरि के अनुसार भाषा में बुद्धितत्त्व

40

7

बौद्ध संस्कृत भाषा चिन्तन प्रक्रिया

51

 

वैयाकरण प्रयोगसिद्धान्त परिप्रेश्ये : छात्री छात्रा

 

6

इति प्रयोगयो सिद्धान्त नागेश-सिद्धान्त

63

7

काशिकाकार का भाषाविषयक योगदान

69

 

संस्कृत भाषा और व्याकरण को भट्टोजि

 

8

दीक्षित का योगदान

75

9

भाट्ट मीमांसक मत में वाक्यार्थ बोध

90

10

आचार्य कुमुदेन्दु का भूवलय में भाषा-चिंतन

107

 

भर्तृहरि और आधुनिक भाषा चिन्तन

 

11

एक तुलनात्मक विश्लेषण

115

12

भरत का निर्वचन-चिन्तन

132

13

संकेत-ग्रह एव आशाधर भट्ट

141

 

शब्दार्थ सम्बन्धे अन्विताभिधानवादिमत

 

14

समालोचनम्

148

 

शैली विज्ञान :

 

15

भारती काव्यशास्त्र के सन्दर्भ में

151

16

पाणिनीय व्याकरण में कारक सम्बन्ध

157

 

 

Sample Page


भारतीय आचार्यो का भाषा चिंतन: The Linguistic Thought of Indian Acharyas

Item Code:
NZD101
Cover:
Hardcover
Edition:
1985
Publisher:
Language:
Sanskrit Text with Hindi Translation
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
190
Other Details:
Weight of the Book: 335 gms
Price:
$15.00   Shipping Free
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पुस्तक के विषय में

अनादि काल से ही भारत में भाषा-चिन्तन की अजल धारा मनीषियों के मानस को सिञ्चित और पल्लवित होती रही है । वैयाकरण । नैयायिक, मीमांसक, काव्यशास्त्र के मर्मज्ञ सभी तो इस भाषा सरिता के पावन जल में मञ्जन कर चुके हैं ।

प्रस्तुत ग्रन्थ में दिल्ली विश्वविद्यालय तथा अन्य प्रख्यात विद्वानों-आचार्य देवेन्द्र नाथ शर्मा, श्री मणिनाथ झा, डा० कृष्ण लग्न, डा० भोलानाथ तिवारी, डा० पुष्पेन्द्र कुमार, डा० कुमारी अरुणा गुप्ता, डा० रघुनाथ पाण्डेय, डा० सूर्यकान्त बाली, डा० रघुवीर वेदालंकार, डा० ब्रह्ममित्र अवस्थी, डा० बलि राम शुक् न, डा० ओम प्रकाश सिंहल, डाट आर० एस० सैनी, डा० रामगोपाल मिश्र, श्री वेद प्रकाश शास्त्री, श्री रमण कुमार शर्मा, श्री जगदीश प्रसाद मिश्र आदि - ने भतृहरि और आधुनिक भाषा चिन्तन; अथर्ववेद में भाषा संबंधी विचार; शिक्षा और प्रतिशाख्य, यास्क का भाषापरक चिन्तन, आचार्य व्याडि का भाषा चिन्तन बौद्ध संस्कृत भाषा- चिंतन प्रक्रिया; काशिकाकार का भाषा विषयक योगदान, संस्कृत भाषा और व्याकरण को भट्टोजि दीक्षित का योगदान; भरत का निर्वचन चिन्तन; भट्ट मीमांसक मत में वाक्यार्थ बोध; आचार्य कुमुदेन्दु का भूवलय में भाषा चिन्तन; आचार्य शौनक का भाषा चिन्तन आदि अन्य अनेक विषयों पर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं ।

About the Author

Dr.Pushpendra Kumar (14.7.36); Reader Sanskrit Deptt. South Delhi Campus, University of Delhi, Delhi; First class First and Gold-Medalist in M.A. (Sanskrit) 1958, Ph.D. 1967; selected by the Govt. of India for Higher Studies as Commonwealth Scholar, studied at the School of Oriental and African Studies, London University; Fellow of the Royal Asiatic Society of Great Britain and Ireland, 1971; visited various European countries. namely England, France, Italy, W. Germany. Austria, Holland & Switzerland for study purposes, started his career in 1959 as University Lecturer and was engaged inPost- Graduate teaching in the University of Delhi; Principal of Shri Lal Bahadur Shastri Kendriya Sanskrit Vidvapeetha. New Delhi; Reader in the Deptt. of Sanskrit South Delhi Campus Delhi University, Delhi 1977; associated with the editing of many research journals; published ten books and twenty five research articles: chief Investigatoil- Major U. G. C. Research project. a Descriptive Catalogue of Sanskrit Inscriptions.

 

Published Books

Sakti Cult in Ancient India (1974); Devi Puran, (1976); M.M.P.N.S. Memorial Vol. 1974; Yogratnamala (Tantric Text with Eng. Trans.) 1980; Aesthetics and Sanskrit litera- ture, 1980. Treatment of Pathos in Sanskrit, Drama 1981, Goddesses in Indian Buddhism, Mahabhagvata Puran 1983. Linguistic Thought in Ancint India 1984.

प्राक्कथन

विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहाँ पर विश्व के क्षितिज पर सर्वप्रथम भाषा का दिव्य प्रकाश फैला था और उसने सारी मानवजाति को चकाचौंध कर दिया । 'इयं या परमेष्ठिनी वाग्देवी ब्रह्मसशिता' अथर्व० । इस भाषा के चमत्कार ने मानवीय संवेदनाओं को दूसरे तक पहुंचाने का एक सुगम एवं सरल उपाय प्रस्तुत किया । 'अयश्गीयस्त्वाच्च शब्देन संज्ञाकरणं व्यवहारार्थ लोके' निरुक्त । फिर प्रारम्भ हुआ सर्वतोमुखी चिन्तन । कभी अर्थरिक्त विचार हुए, कभी पदविभाजन पर विचार हुए । निर्वचनों के व्याकरणागत संस्कार पर आचार्यों ने अपने अपने मन्तव्य प्रस्तुत किये । वेदों से प्रारम्भ कर आधुनिक युग तक भारतीय मनीषी भाषा की गहन परतों को उद्घाटित करने में लगे हुए है । विशेषता भारत की यह रही है कि जब सारा विश्व अज्ञान के अन्धकार में विलीन था उस समय हमारे ऋषि एवं आचार्य भाषा के विभिन्न पहलुओं पर चिन्तन प्रारम्भ कर चुके थे । आधुनिक युग में तो पश्चिम के विद्वान् भी अथक परिश्रम एवं लगन से इस वाग्देवी की उपासना में संलग्न हैं । यह वाग्देवी भी अपने उपासकों को ज्ञान की झलक देकर उनको पुरस्कृत करती रहती है तथा उनके द्वारा किये गये शोध कार्यो द्वारा मानव हृदय की गहराइयों को समझने में हम काफी सक्षम हो रहे एं । यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ 'अन्तिमेत्थम्' रूप से कुछ भी नही कहा जा सकता है ।

भाषा ही वह इकाई है जिसने मानव जाति को एक सूत्र में पिरो कर रखा हुआ है

(यजुर्वेद २६ । २)

एक भाषा बोलने वाले लोग अपने को अधिक निकट का अनुभव करते हैं 'Linguistic affinity is the strongest' यह विश्व के सभी लोग एकमत होकर स्वीकार करते है । इसी प्रकार भारतीय धरातल को जिसमें विभिन्न धर्म को मानने वाले, अनेक नृवंशों से सम्बन्ध रखने वाले तथा विभिन्न भूभागों से आने वाले गर्व समाज निवास करते है उनको एक सूत्र में बाँधने का काम संस्कृत भाषा ने किया है।दक्षिण में कन्याकुमारी से लेकर उत्तर में हिमालय की ऊचाइयों तक, 'आसेतुहिमालयात्' सभी जगह संस्कृत ने अपनी गहरी जड़ें फैला रखी हैं । उसी संस्कृत भाषा के आचार्यों ने भाषा के क्षेत्र में समय-समय पर जो चिन्तन प्रस्तुत किये हैं उनका एक मूल्यांकन यथासम्भव एवं यथाशक्ति प्रस्तुत किया जा सके, इस विचार से संस्कृतपरिषद्, दक्षिण परिसर, दिल्ली विश्वविद्यालय मे एक द्विदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया-'भारतीय आचार्यो का भाषा- चिन्तन ।' इस विषय पर लगभग एक सौ से अधिक विद्वानो ने इसमें भाग लिया तथा संगोष्ठी को सफल किया । उस संगोष्ठी के विचार-विनिमय का निष्कर्ष आपके समक्ष पुस्तक रूप में प्रस्तुत है ।

वेद भाषा की प्राचीनतम उपलब्ध कृति होने के कारण वेदों को ज्ञान का भण्डार स्वीकार किया गया है । अत: शब्द ब्रह्म का चिन्तन वैदिक काल से ही प्रारम्भ हो गया था । वेदो के प्रसिद्ध विद्वान् सर्वश्री वेदप्रकाश शास्त्री ने 'वेद में भाषातत्व' नामक प्रस्तुत निबन्ध में अपने विचार व्यक्त किये हैं । वाणी के चार रूप-परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी आदि का संकेत ऋग्वेद में उपलब्ध है ।

'चत्वारि वाक्परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।

गुहा त्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति । ऋग्वेद १ । १६५।४५

अन्तर, वर्ष, विभ्रनरक्तियां, उपसर्ग, क्रियायें, नाम, विशेषण, समास, सन्धियां, छन्द, प्रत्यय, वाक्यरचना और अलंकार आदि सभी तो वेदों में उपलब्ध हैं । प्रोफेसर कृष्णलाल ने अथर्ववेद में भाषा सम्बन्धी विचार पर अपना लेख लिखा है । अथर्ववेद में गौ शब्द वाणी के लिये प्रयुक्त हुआ है । अथर्ववेद में भाषा को विराट् कहा गया है । वैश्वनरी कहा है अर्थात् वह लोगों में व्याप्त है-सब को ले जाने वाली है । वह परमेष्ठिनी अर्थात् सर्वोच्च पद पर अधिष्ठित है । भाषा सबको ज्ञानरूपी दूध का पान कराने वाली माता है ।

प्रोफेसर भोलानाथ तिवारी ने प्रातिशाख्यों और शिक्षाग्रन्थों में भाषा के मूल तत्व अर्थात् ध्वनियों पर विचार विमर्श प्रस्तुत किया है । यह ध्वनि विचार उस काल का है जब विश्व में कहीं भी भारत के अतिरिक्त इतना गम्भीर विवेचन नहीं हो रहा था । तदनन्तर डा० पुष्पेन्द्र कुमार ने विश्व के प्रथम भाषा वैज्ञानिक आचार्य यास्क के भाषापरक विचारो पर निबन्ध प्रस्तुत किया है । यास्क ने अपनी बहुमूल्य देन-'नामानि आख्यातजानि'अर्थात् नाम आख्यतज हैं-कह कर भाषा विज्ञान की सुखद नींव रख दी थी । यास्क ने चार प्रकार के शब्द समूह, उपसर्गों का स्वतन्त्र अस्तित्व, शब्दों की अर्थवत्ता तथा नित्यता, एवं निर्वचन के सिद्धान्तो का निर्देशन करके एक महत्वपूर्ण पद्धति का विकास किया था । परवर्त्ती आचार्य यास्क के महत्व को तथा उनके योगदान को सदैव स्मरण रखेंगे ।

आचार्य व्याडि का 'संग्रह' ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता परन्तु व्याडि के नाम से कुछ विचार अन्य ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं । उन्हीं को आधार बनाकर कु० अरुणा गुप्ता ने व्याडि के भाषा परक चिन्तन को प्रस्तुत किया है । डा० रघुनाथ पाण्डेय ने बौद्धों की भाषा चिन्तन प्रक्रिया को बड़े ही विद्वत्ता- पूर्ण लेख में प्रस्तुत किया है ।

प्रोफेसर मणिनाथ झा ने कुछ विशिष्ट शब्द प्रयोगों को अपना विचार- बिन्दु बनाकर प्राचीन आचार्यो के भाषापरक चिन्तन को विद्वानों के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया है । श्रीरमण कुमार शर्मा द्वारा लिखित निबन्ध में 'भाषा चिन्तन में प्रतिभा की अवधारणा-भारत के विभिन्न आचार्यों द्वारा प्रतिपादित प्रतिभा-सिद्धान्त' पर विचार व्यक्त किये हैं । यह एक ऐसा सिद्धान्त हे जिस पर बहुत से आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में विचार व्यक्त किये हैं । डा० रधुवीर वेदालंकार 'काशिका' के एक विशिष्ट विद्वान् हैं । उन्होने काशिकाकार द्वारा निबद्ध भाषा परक चिन्तन को हमारे सामने रखा है । उसी प्रकार डा० सूर्यकान्त बाली ने बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से परवर्त्ती वैयाकरण भट्टोजिदीक्षित का संस्कृत भाषा को योगदान' लेख में भट्टोजिदीक्षित के एक नये स्वरूप को उद्घाटित किया है । परवर्त्ती काल के आचार्यो में आचार्य भट्टोजिदीक्षित ने अपना एक विशिष्ट स्थान बना रखा है तथा पाणिनि को छोड़ कर सभी आचार्यों को उन्होंने पीछे छोड़ दिया है । वे भाषा परक चिन्तन के क्षेत्र में सदा ही स्मरणीय रहेंगे ।

आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा उस संगोष्ठी के प्रथम तथा प्रमुख वक्ता थे । उन्होँने अपने वैदुष्यपूर्ण लेख में भर्त्तृहरि के महत्व को आधुनिक भाषा विज्ञान के सन्दर्भ में पूर्णरूप से उद्घाटित किया है । आचार्य भर्त हरि ने भाषा-चिंतन को एक दर्शन शास्त्र का पद प्रदान किया है । उन्होंने शब्द की व्यापकता पर दृष्टि डालते दृष्टि-शब्द को ब्रह्म ही स्वीकार किया है ।

'अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्व यदक्षरम् ।'आचार्य भर्तृ' हरि एक क्रान्तिकारी भाषा वैज्ञानिक के रूप में याद किवे जाते रहेंगे । उनकी वाक्यपदीय भाषाचिन्तन के क्षेत्र में नये मानदण्ड स्थापित करने में एक अक्षय कोष का काम कर रही है । जितनी गहराई तक आचार्य भर्तृ हरि पहुंच गये थे उतनी गहराई तक शायद ही कोई पश्चिम का विद्वान् पहुँचा हो । डा० कंवर लाल ने आचार्य शौनक द्वारा प्रतिपादित भाषा सिद्धान्तों का विवेचन किया है । भारतीय व्याकरण शास्त्र में 'स्फोटवाद' की बड़ी चर्चा रही है । इस विषय पर शोधपूर्ण निबन्ध लिख रहे हैं श्रीरमण कुमार शमा । इन्होने बड़े ही परिश्रम से 'स्फोट' को बड़े ही सुन्दर शब्दों में समझाने का प्रयत्न किया है ।

डा० रामगोपाल मिश्र ने नाट्यशास्त्र के रचयिता आचार्य भरत का निर्वचन-चिन्तन प्रस्तुत करके काव्यशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में एक नयी चिन्तन दिशा प्रस्तुत की है । डा० ब्रह्ममित्र अवस्थी ने 'भाट्ट मीमांसक के मत में वाक्यार्थबोध' की प्रकिया पर विद्वत्तापूर्ण लेख लिखा है तथा इस गुत्थी को सुलझाने में बड़ा ही परिश्रम किया है । डा० बलराम शुक्ल ने ''शब्दार्थ- सम्बन्धे अन्विताभिधानवादिन' इस लेख में वाक्यार्थ बोध के दूसरे पक्ष को उद्घाटित किया है । डा० जगदीश प्रसाद मिश्र ने 'आशाधर भट्ट एवं संकेत- ग्रह' पर विचारों को अभिव्यक्त किया है । डा० रणजीत सिंह सैनी ने आचार्य कुमुदेन्दु द्वारा रचित भूवलय ग्रन्थ को आधार बनाकर लेख लिखा है । आचार्य कुमुदेन्दु कुछ क्रान्ति करना चाहते थे और इसी विचार से उन्होंने 'भूवलय में संख्या को आधार वनाकर भाषा को समझने के सूत्र प्रदान किये हैं । यह एक नयी दिशा दी आचार्य कुमुदेन्दु ने । आधुनिक युग में शैली-विज्ञान नाम से भाषा संरचनात्मक स्वरूप पर विचार किया जा रहा है । प्राचीन आचार्यों ने सम्भवत: इसी को रीतियों में परिगणित किया था । इस आधुनिकतम विषय पर लिख रहे हैं डा० ओमप्रकाश सिंहल । ये शैली विज्ञान का भारतीय काव्य शास्त्र के साथ क्या सम्बन्ध हो सकता है, इस विषय पर उनके विचार पठनीय हैं ।

भाषाचिन्तन के क्षेत्र में इन निबन्धों का एक अपना महत्व है । भाषा की गुत्थियों को समझने में ये निबन्ध काफी सीमा तक सहायक हो सकेंगे ऐसा हमारा विश्वास है । यह तो प्रारम्भिक प्रयास है--आशा है इस दिशा में एक सर्वतोमुखी प्रयत्न का यह एक शुभारम्भ है । मैं उन सभी विद्वानों का जिन्होंने निबन्ध लिखकर दिये हैं तथा कठिन विषयों पर अपनी लेखनीउठाई है-हृदय से आभारी हूं । जिन विद्वान् वक्ताओं ने अपने अपने विचार मौलिक रूप से व्यक्त किये उन सभी का धन्यवाद है । प्राचीन आचार्यो के प्रति जिन्होंने उस प्राचीन काल में दिशा-निर्देश कर दिये थे-परन्तु हम जिन्हें भूल बैठे थे-शब्दों में कृतज्ञता ज्ञापन सम्भव नही-यही कहा जा सकता है कि इस प्रयास के माध्यम से हम उनके प्रयासो एवं प्रयत्नों को आगे बढ़ाकर अपनी श्रद्धा के सुमन अर्पित करते हैं ।

मैं अपने सहयोगियों डा० कृष्ण लाल, डा० योगेश्वरदत्त शर्मा, डा० रणजीत सिंह सैनी, डा० दीप्ति त्रिपाठी, डा० श्रवण कुमार सिन्हा, डा० महावीर, डा० सत्यपाल नारंग एवं अन्य सभी के साक्रिय सहयोग एवं हार्दिक समर्थन के लिए हृदय से कृतज्ञ हूँ । बिना जिनके सहयोग के यह प्रयास असम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य था । इस ज्ञान यज्ञ की सफलता काश्रेय मेरे सभी सहयोगी बन्धुओं को है । दक्षिण परिसर के उन कर्मचारी बन्धुओं के प्रति मैं नतमस्तक हूं जिन्होंने निष्कामभाव से नेपथ्य में रह कर इस ज्ञान गंगा को प्रवाहित करने में अपने भगीरथ प्रयत्न एवं सहायता सदैव सहर्ष प्रदान की ।

अन्त में मैं मैसर्स नाग पब्लिशर्स के अध्यक्ष श्री नागशरण सिंह, तथा उनके सुपुत्र श्री नरेन्द्र प्रताप तथा श्री सुरेन्द्र प्रताप का हृदय से आभारी हूं । मेरे एक निवेदन पर ही इस ज्ञानयज्ञ में अपनी सहायता प्रदान करने को तत्पर हो जाते है । इस पुस्तक को सुन्दर रूप मे प्रस्तुत करने का श्रेय सभी इन महानुभावो को है ।

अन्त मे मैं सुधी जनों से क्षमा प्रार्थना करता हृ कि इस प्रयास में जो त्रुटि रह गई हो उनको नजर अन्दाज करते हुये मेरे इस प्रयास मे अपना सम्बल प्रदान करके मेरा उत्साहसंवर्धन करेंगे। यजुर्वेद के वाक्य के साथ अपने निवेदन को पूर्ण करता हूं । यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्य:

 

 

विषय-सूची

 

प्राक्कथन

 

1

वेद में भाषा-तत्व

1

2

अथर्ववेद मैं भाषा-सम्बन्धी विचार

11

3

शिक्षा और प्रातिशाख्य में भाषा-चिंतन

19

4

आचार्य व्याडि का भाषा-चिन्तन

25

5

यास्क का भाषा-परक चिन्तन

35

6

भर्तृहरि के अनुसार भाषा में बुद्धितत्त्व

40

7

बौद्ध संस्कृत भाषा चिन्तन प्रक्रिया

51

 

वैयाकरण प्रयोगसिद्धान्त परिप्रेश्ये : छात्री छात्रा

 

6

इति प्रयोगयो सिद्धान्त नागेश-सिद्धान्त

63

7

काशिकाकार का भाषाविषयक योगदान

69

 

संस्कृत भाषा और व्याकरण को भट्टोजि

 

8

दीक्षित का योगदान

75

9

भाट्ट मीमांसक मत में वाक्यार्थ बोध

90

10

आचार्य कुमुदेन्दु का भूवलय में भाषा-चिंतन

107

 

भर्तृहरि और आधुनिक भाषा चिन्तन

 

11

एक तुलनात्मक विश्लेषण

115

12

भरत का निर्वचन-चिन्तन

132

13

संकेत-ग्रह एव आशाधर भट्ट

141

 

शब्दार्थ सम्बन्धे अन्विताभिधानवादिमत

 

14

समालोचनम्

148

 

शैली विज्ञान :

 

15

भारती काव्यशास्त्र के सन्दर्भ में

151

16

पाणिनीय व्याकरण में कारक सम्बन्ध

157

 

 

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