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Books > Hindi > साहित्य > साहित्य का इतिहास > आज़ादी की लड़ाई के ज़ब्तशुदा तराने: Songs Censored in The Freedom Struggle
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आज़ादी की लड़ाई के ज़ब्तशुदा तराने: Songs Censored in The Freedom Struggle
Pages from the book
आज़ादी की लड़ाई के ज़ब्तशुदा तराने: Songs Censored in The Freedom Struggle
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Description

पुस्तक के विषय में

कविता ज्यदा से मानवीय प्रेरणा का महत्वपूर्ण माध्यम रही है । स्वतंत्रता आदोलन इसकी उत्कृष्ट मिसाल है । ब्रिटिश शासन के विरूद्ध संघर्ष का शंखनाद फूंकते हुए कविता ने आम आदमी को इस संघर्ष के लिए प्रेरित किया और लोगों ने हंसते-हंसते अपने वतन के लिए जिंदगी तक कुर्बान कर दी । इन बलिदानियों में कुछ ऐसे भी थे, जो स्वयं कवि थे ।

ब्रिटिश हुकूमत कविता की इस आंदोलनकारी भूमिका से अपरिचित नहीं थी और इसीलिए समय-समय पर इस तरह के साहित्य को जस्त करती रही । ये कविताए न केवल उस समय के जनाक्रोश और आकाक्षाओं को ही व्यक्त करती हैं, बल्कि उरग दौर का ऐतिहासिक दरत्तावेज भी हैं ।

प्रथम संस्करण की भूमिका

कविता की समाज में भूमिका दोहरी है । एक ओर तो वह समाज से प्रभाव ग्रहण करती है, दूसरी ओर वह समाज को प्रभावित करती है । वह अपने समय को अंकित करते हुए भी, कभी-कभी समय के पार जाकर नए मूल्य स्थापित करती है। उसकी भूमिका मनुष्य को अधिक मानवीय और अधिक बेहतर मनुष्य बनाने की होती है। जहां वह उसके कोमल मनोभावों का स्पर्श करती है, वहीं वह मनुष्य की चेतना को भी जगाती है और उसमें नई स्फूर्ति और नया उत्साह भरती है । कविता का इतिहास साक्षी है कि कविता ने अलग- अलग युग में जन-चेतना को जाग्रत किया है और उसे संघर्ष के लिए प्रेरित किया है।

कविता ने स्वयं हमारी आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद फूंकते हुए उसने आम आदमी को जान देने तक के लिए प्रेरित किया और लोगों ने हंसते-हंसते अपने वतन के लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान कर दी बल्कि इन बलिदानियों में कुछ ऐसे भी थे, जो स्वयं भी कविता लिखते थे । रामप्रसाद 'बिस्मिल' और अशफ़ाक़उल्ला ख़ां ने कविता लिखने के साथ-साथ भारत को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद कराने के लिए जमकर संघर्ष भी किया और आखिर फांसी के फंदे पर झूल गए ।

शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने आत्मोत्सर्ग की भावना को इस प्रकार व्यक्त किया था।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है:

देखना है जोर कितना बाज़ू--क़ातिल में है।

उनके साथी अशफ़ाक़उल्ला ख़ां ने देश की आज़ादी और खुशहाली के आगे अपने जीवन को महत्वहीन बताते हुए कहा था:

वतन हमारा रहे शादकाम और आज़ाद

हमारा क्या है, अगर हम रहे रहे न रहें।

ब्रिटिश हुकूमत कविता की इस आंदोलनकारी भूमिका से अपरिचित नहीं थी और इसीलिए उसने कविता सहित समस्त साहित्य को ज़ब्त कर लिया थाऔर उनके लेखक, प्रकाशकों को भी जेलों में भर दिया । उसने जनसाधारण को तरह-तरह की यातनाएं दीं, क्रांतिकारियों पर अनेक अत्याचार किए और विरोध व विद्रोह के स्वरों को दबाने का निरंतर प्रयास किया ।

पर विदेशी सरकार के विरोध और जनजाग्रति का यह सिलसिला रुका नहीं । उनका मक़सद था- आजादी, जो उनकी आत्मा को पुकार रही थी । महाकवि जयशंकर प्रसाद ने आह्वान किया -हिमाद्रि तुन श्रृंग से

प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयप्रंभा समुज्ज्वला

स्वतत्रता पुकारती

प्रवीर हो जयी बनो

बड़े चलो ! बड़े चलो !

विदेशी सत्ता का अत्याचार इतना बढ़ गया था कि आम जनता भूख और ग़रीबी का सामना कर रही थी । इस स्थिति के प्रति विद्रोही तेवर दिखाते हुए जमील मज़हरी कहते हैं :

ग़रीब बच्चे कौन के बिलख रहे हैं भूख से

खुदा का अर्श हिल रहा है मानता की हूक वे

गिरे न सर पर आसमां बढ़े चलो! बढ़े चलो।

बिरादराने- नौजवां बढ़े चलो! बढ़े चलो!

जन-विद्रोह को वाणी देते हुए प्रहलाद पांडे 'शशि' ने लिखा :

द्रोह क्रमश: रवि-किरण-सा,

छा रहा भू पर हमारा ।

अग्निवाही बन जगत में

ला रहा खूनी सबेरा ।

नए युग की नव प्रभाती से

जगाता नव्य यौवन

क्रातिकारी स्वर-लहर में

जागरण संदेश नूतन

इस जनांदोलन में नवयुवकों के अलावा बच्चे, बूढ़े और महिलाएं- सभी शामिल थे । युवक अपने माता-पिता से प्रेरणा ले रहे थे और माता-पिता अपने बच्चों से आशाएं संजो रहे थे । इस संदर्भ में अख्तर शीरानी की ये पंक्तियां द्रष्टव्य हैं

वतन की जंगे-आज़ादी में जिसने सिर कटाया है?

यह उस शैदा--तिफ़ली बाप का पुरजोश बेटा है?

अभी से आलमे-तिफ़ली का हर अंदाज़ कहता है

वतन का पासबां होगा

मेरा नन्हा जवां होगा!

जनता के मन में विद्रोह इस सीमा तक आ गया था कि वह कारा के बंधन तोड्ने के लिए उतावली हो चुकी थी ।

मशहूर शायर जोश मलीहाबादी कहते हैं :

क्या हिंद का ज़िदां कांप रहा है: गूंज रही हैं तकबीरें,

उकताएं हैं शायद कुछ कैदी और तोड़ रहे हैं ज़ंजीरें दीवारों के नीचे आ-आकर यूं जमा हुए हैं ज़िंदानई सीनों में तलातुम बिजली कम् आखों में झलकती शमशीरें संभलो कि वो ज़िंदा गूंज उठा, झपटो कि वो क़ैदी छूट गए, उट्ठो कि वो बैठीं दीवारें दौड़ो कि वो टूटी ज़ंजीरें! कुछ कवियों ने अपनी बात व्यंग्यात्मक लहजे में भी कही है । मशहूर शायर हफ़ीज़ जालंधरी की ये पंक्तियां ब्रिटिश शासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी बात कहती हैं।

ड़ंसां भी कुछ शेर हैं? बाक़ी भेड़ों की आबादी है

भेड़ें सब पाबंद हैं लेकिन शेरों को आज़ादी है

शेर के आगे भेड़ें क्या हैं: इक मनभाता खाजा है:

बाक़ी सारी दुनिया परजा शेर अकेला राजा है

भेड़ियों ही से गोया कायम अन्य है इस आबादी कर

भेड़ें जब तक शेर न बन लें शम न लें आज़ादी का!

इन कवियों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जान की बाजी लगा देने वाले क्रांतिकारियों की प्रशस्ति भी गाई है । जांनिसार 'अख्तर' की ये पंक्तियां इस संदर्भ में देखने लायक़ हैं।

जो रख देते हैं सीना गर्म तोपों के दहानों पर

नज़र से जिनकी बिजली कौंधती है आसमानों पर

मैं उनके गीत गाता हूं मैं उनके गीत गाता हूं

जो आज़ादी की देवी को लहू की भेंट देते हैं,

सदाक़त के लिए जो हाथ में तलवार लेते हैं:

मैं उनके गीत गाता हूं मैं उनके गीत गाता हूं।

देशवासियों में हंसते-हंसते अपनी मातृभूमि पर बलिदान हो जाने की भावना भरते हुए सागर निज़ामी लिखते हैं।

हुक्म आखिर क़त्लगाह में जब सुनाया जाएगा

जब मुझे फांसी के तख्ते पर चढ़ाया जाएगा,

ऐ वतन! उस वक्त भी मैं तेरे कने गाऊंगा

अहद करता हूं कि मैं तुझ पर फ़िदा हो जाऊंगा।

कवियों ने अपनी कविताओं में तरह-तरह से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है । यह ज़रूरी नहीं है कि हर कविता काव्यात्मक दृष्टि से भी श्रेष्ठ हो । वैसे भी जनभावनाओं को काव्यात्मकता की कसौटी पर कसना एक तरह से उन पर अन्याय ही होगा । मुख्य बात यही नहीं है कि ये कविताएं उस समय के जनाक्रोश को ही व्यक्त करती हैं और इसी कारण विदेशी सत्ता ने इन पर प्रतिबंध लगाया और इन्हें जस्त किया, बल्कि ये एक दौर का ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी हैं।

स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर ऐसी ही कुछ कविताओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। यह संग्रह उन कवियों, शायरों और देश पर बलिदान होने वाले सपूतों के प्रति एक विनम्र श्रद्धांजलि है।

इस संग्रह की सामग्री मुख्यत: समाजवादी शिक्षण संस्थान (अध्यक्ष चंद्रजीत यादव) तथा राष्ट्रीय अभिलेखागार द्वारा प्रकाशित पुस्तकों से ली गई है । अत: हम इनके आभारी हैं ।

 

विषय-सूची

1

ग़ज़ल

1

2

स्वतंत्र भारत

2

3

चलो जेलखाने

4

4

हुब्बे-वतन

6

5

भारत है जान हमारी

7

6

पंजाब का हत्याकांड

8

7

शहीदे-वतन की आरज़ू

10

8

मुक़द्दमा-ए-साज़िशे-लाहौर

11

9

भगतसिंह और दत्त

12

10

दार पर चढ़कर दिखा देंगे

14

11

स्वदेशी गाढ़ा

15

12

पैग़ामे-हयात

16

13

दीवाने बहुत

17

14

ऐ खुफ़्ताबख़्ते-हिंदी

18

15

वंदे मातरम

19

16

असेंबली में बम

20

17

दफ्तर की तलाशी

21

18

ऐ फ़िरंगी

22

19

ऐवाने-पार्लमेंट में गर्मागर्मी

23

20

कर देंगे ज़ालिमों का

25

 

अब बंद ज़ुल्म ढाना

 

21

लोरी

26

22

हिंदोस्तान

29

23

मां की दुआ

30

24

मन की भूल

31

25

शोरिशे-जुनूं

34

 

हम रहे, रहे न रहे

 

27

एक जलावतन की वापसी

36

 

गुलामी की खुसूसियात

38

28

लाएगा रंग एक दिन

39

 

खूने-खां हमारा

 

29

हिंदोस्तां हमारा

41

30

पयामे-हुर्रियत

42

31

तराना-ए-आज़ादी

43

32

वतन क़ैद से अब छुड़ाना पड़ेगा

45

33

यह निज़ामे-कुहना

47

34

शहाबे-साक़िब

50

35

देशभक्त का प्रलाप

51

36

खून की तड़प

52

37

मिस्टर दास बिस्तरे-मर्ग पर

53

38

मुझे गोलियों से उड़ा दिया

55

39

घर जला भाई का

57

40

हुब्बे-वतन

58

41

ग़ज़ल

59

42

इंक़लाब

60

43

झंडा महिमा

62

44

जज़्बाते-अख़्तर

63

45

भारत के लाल दोनों

65

46

ग़ज़ल दादरा चरखा

66

47

तख्त या तख्ता

68

48

नाल-ए-जरस

69

49

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से

73

50

मैं उनके गीत गाता हूं

74

51

नारियों का प्रोत्साहन

76

52

शिकस्ते ज़िंदां का ख़्वाब

79

53

फुऱकते- 'दास'

80

54

निदा-ए-वक़्ते

82

55

चाहिए

84

56

ग़ज़ल

85

57

ज़ालिम से

86

58

आज़ादी या मौत

87

59

पयामे-बेदारी

89

60

सितम की इंतिहा क्या है

93

61

देश रक्षा के लिए

94

 

जान का जाना अच्छा

 

62

हम करेंगे या मरेंगे

95

63

मौत बेहतर है अगर

99

64

भारत के रहने वालो

100

65

छोड़ दे

102

66

खाके-हिंद

103

67

आज़ादी-ए-वतन

106

68

बेकसों का ईश्वर

108

69

कमख्वाब बे-फ़रोग़ है

109

70

पुष्प की अभिलाषा

111

71

हिंदुस्तानी आज़ाद

112

 

जमाअत का पैंफ्लेट

 

72

दावते-जंग

114

73

हिंदियों का राज

117

74

कड़े मरहले

119

75

मांझी

121

76

जवाके उठो

122

77

बेदारी-ए-मशरिक

124

78

सरफरोशी की तमन्ना

127

79

वीर बालिकाएं

128

80

भारत की आन

129

81

तराना-ए-आज़ादी

130

82

मैदाने-जंग में सुबह

132

83

ग़म नहीं है वार की

134

84

देश के हित जान जाए

135

 

तो भी घबड़ाना नहीं

 

85

विदा करो मां, जाते हैं हम

137

 

विजय ध्वजा फहराने

 

86

रक्षाबंधन

138

87

जवान जज़्बे

140

88

वक़्त बिताने को

141

89

एक शैदाए-वतन

143

 

के आदर्श विचार

 

90

कफ़न होगा हमारी

144

 

लाश पर

 

91

राष्ट्रीय झंडा

145

92

हिंदू-मुस्लिम एकता

147

93

युवकों की प्रतिज्ञा

148

94

जलियांवाला बाग

150

95

आगे बढ़ेंगे

151

96

मजबूरियां

153

97

अहद

154

98

शोला नवाई

156

99

'दास' की शहादत

157

100

घबराने से कुछ

158

 

हासिल नहीं

 

101

आज़ादी की देवी

160

102

देश की लाजा

165

 

झंडा झुकने न दो

 

103

जज़्बाते-नासिर

166

104

खादी गीत

167

105

धर्म

169

106

आज़ादी

170

107

प्यारा हिंदोस्तां हमारा

173

108

आज़ादी या मौत

174

109

निजाते-हिंद

175

110

क़ौम पे हम

176

 

हर चीज़ फ़िदा

 

111

हो गए तैयार अब

177

 

कुछ कर दिखाने के लिए

 

112

तरही पोलिटिकल

179

 

मुशायरा

 

 

Sample Page


आज़ादी की लड़ाई के ज़ब्तशुदा तराने: Songs Censored in The Freedom Struggle

Item Code:
NZD238
Cover:
Paperback
Edition:
2013
ISBN:
9788123017778
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
191
Other Details:
Weight of the Book: 35 gms
Price:
$11.00   Shipping Free
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आज़ादी की लड़ाई के ज़ब्तशुदा तराने: Songs Censored in The Freedom Struggle
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पुस्तक के विषय में

कविता ज्यदा से मानवीय प्रेरणा का महत्वपूर्ण माध्यम रही है । स्वतंत्रता आदोलन इसकी उत्कृष्ट मिसाल है । ब्रिटिश शासन के विरूद्ध संघर्ष का शंखनाद फूंकते हुए कविता ने आम आदमी को इस संघर्ष के लिए प्रेरित किया और लोगों ने हंसते-हंसते अपने वतन के लिए जिंदगी तक कुर्बान कर दी । इन बलिदानियों में कुछ ऐसे भी थे, जो स्वयं कवि थे ।

ब्रिटिश हुकूमत कविता की इस आंदोलनकारी भूमिका से अपरिचित नहीं थी और इसीलिए समय-समय पर इस तरह के साहित्य को जस्त करती रही । ये कविताए न केवल उस समय के जनाक्रोश और आकाक्षाओं को ही व्यक्त करती हैं, बल्कि उरग दौर का ऐतिहासिक दरत्तावेज भी हैं ।

प्रथम संस्करण की भूमिका

कविता की समाज में भूमिका दोहरी है । एक ओर तो वह समाज से प्रभाव ग्रहण करती है, दूसरी ओर वह समाज को प्रभावित करती है । वह अपने समय को अंकित करते हुए भी, कभी-कभी समय के पार जाकर नए मूल्य स्थापित करती है। उसकी भूमिका मनुष्य को अधिक मानवीय और अधिक बेहतर मनुष्य बनाने की होती है। जहां वह उसके कोमल मनोभावों का स्पर्श करती है, वहीं वह मनुष्य की चेतना को भी जगाती है और उसमें नई स्फूर्ति और नया उत्साह भरती है । कविता का इतिहास साक्षी है कि कविता ने अलग- अलग युग में जन-चेतना को जाग्रत किया है और उसे संघर्ष के लिए प्रेरित किया है।

कविता ने स्वयं हमारी आज़ादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष का शंखनाद फूंकते हुए उसने आम आदमी को जान देने तक के लिए प्रेरित किया और लोगों ने हंसते-हंसते अपने वतन के लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान कर दी बल्कि इन बलिदानियों में कुछ ऐसे भी थे, जो स्वयं भी कविता लिखते थे । रामप्रसाद 'बिस्मिल' और अशफ़ाक़उल्ला ख़ां ने कविता लिखने के साथ-साथ भारत को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद कराने के लिए जमकर संघर्ष भी किया और आखिर फांसी के फंदे पर झूल गए ।

शहीद रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने आत्मोत्सर्ग की भावना को इस प्रकार व्यक्त किया था।

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है:

देखना है जोर कितना बाज़ू--क़ातिल में है।

उनके साथी अशफ़ाक़उल्ला ख़ां ने देश की आज़ादी और खुशहाली के आगे अपने जीवन को महत्वहीन बताते हुए कहा था:

वतन हमारा रहे शादकाम और आज़ाद

हमारा क्या है, अगर हम रहे रहे न रहें।

ब्रिटिश हुकूमत कविता की इस आंदोलनकारी भूमिका से अपरिचित नहीं थी और इसीलिए उसने कविता सहित समस्त साहित्य को ज़ब्त कर लिया थाऔर उनके लेखक, प्रकाशकों को भी जेलों में भर दिया । उसने जनसाधारण को तरह-तरह की यातनाएं दीं, क्रांतिकारियों पर अनेक अत्याचार किए और विरोध व विद्रोह के स्वरों को दबाने का निरंतर प्रयास किया ।

पर विदेशी सरकार के विरोध और जनजाग्रति का यह सिलसिला रुका नहीं । उनका मक़सद था- आजादी, जो उनकी आत्मा को पुकार रही थी । महाकवि जयशंकर प्रसाद ने आह्वान किया -हिमाद्रि तुन श्रृंग से

प्रबुद्ध शुद्ध भारती

स्वयप्रंभा समुज्ज्वला

स्वतत्रता पुकारती

प्रवीर हो जयी बनो

बड़े चलो ! बड़े चलो !

विदेशी सत्ता का अत्याचार इतना बढ़ गया था कि आम जनता भूख और ग़रीबी का सामना कर रही थी । इस स्थिति के प्रति विद्रोही तेवर दिखाते हुए जमील मज़हरी कहते हैं :

ग़रीब बच्चे कौन के बिलख रहे हैं भूख से

खुदा का अर्श हिल रहा है मानता की हूक वे

गिरे न सर पर आसमां बढ़े चलो! बढ़े चलो।

बिरादराने- नौजवां बढ़े चलो! बढ़े चलो!

जन-विद्रोह को वाणी देते हुए प्रहलाद पांडे 'शशि' ने लिखा :

द्रोह क्रमश: रवि-किरण-सा,

छा रहा भू पर हमारा ।

अग्निवाही बन जगत में

ला रहा खूनी सबेरा ।

नए युग की नव प्रभाती से

जगाता नव्य यौवन

क्रातिकारी स्वर-लहर में

जागरण संदेश नूतन

इस जनांदोलन में नवयुवकों के अलावा बच्चे, बूढ़े और महिलाएं- सभी शामिल थे । युवक अपने माता-पिता से प्रेरणा ले रहे थे और माता-पिता अपने बच्चों से आशाएं संजो रहे थे । इस संदर्भ में अख्तर शीरानी की ये पंक्तियां द्रष्टव्य हैं

वतन की जंगे-आज़ादी में जिसने सिर कटाया है?

यह उस शैदा--तिफ़ली बाप का पुरजोश बेटा है?

अभी से आलमे-तिफ़ली का हर अंदाज़ कहता है

वतन का पासबां होगा

मेरा नन्हा जवां होगा!

जनता के मन में विद्रोह इस सीमा तक आ गया था कि वह कारा के बंधन तोड्ने के लिए उतावली हो चुकी थी ।

मशहूर शायर जोश मलीहाबादी कहते हैं :

क्या हिंद का ज़िदां कांप रहा है: गूंज रही हैं तकबीरें,

उकताएं हैं शायद कुछ कैदी और तोड़ रहे हैं ज़ंजीरें दीवारों के नीचे आ-आकर यूं जमा हुए हैं ज़िंदानई सीनों में तलातुम बिजली कम् आखों में झलकती शमशीरें संभलो कि वो ज़िंदा गूंज उठा, झपटो कि वो क़ैदी छूट गए, उट्ठो कि वो बैठीं दीवारें दौड़ो कि वो टूटी ज़ंजीरें! कुछ कवियों ने अपनी बात व्यंग्यात्मक लहजे में भी कही है । मशहूर शायर हफ़ीज़ जालंधरी की ये पंक्तियां ब्रिटिश शासन की धज्जियां उड़ाते हुए अपनी बात कहती हैं।

ड़ंसां भी कुछ शेर हैं? बाक़ी भेड़ों की आबादी है

भेड़ें सब पाबंद हैं लेकिन शेरों को आज़ादी है

शेर के आगे भेड़ें क्या हैं: इक मनभाता खाजा है:

बाक़ी सारी दुनिया परजा शेर अकेला राजा है

भेड़ियों ही से गोया कायम अन्य है इस आबादी कर

भेड़ें जब तक शेर न बन लें शम न लें आज़ादी का!

इन कवियों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जान की बाजी लगा देने वाले क्रांतिकारियों की प्रशस्ति भी गाई है । जांनिसार 'अख्तर' की ये पंक्तियां इस संदर्भ में देखने लायक़ हैं।

जो रख देते हैं सीना गर्म तोपों के दहानों पर

नज़र से जिनकी बिजली कौंधती है आसमानों पर

मैं उनके गीत गाता हूं मैं उनके गीत गाता हूं

जो आज़ादी की देवी को लहू की भेंट देते हैं,

सदाक़त के लिए जो हाथ में तलवार लेते हैं:

मैं उनके गीत गाता हूं मैं उनके गीत गाता हूं।

देशवासियों में हंसते-हंसते अपनी मातृभूमि पर बलिदान हो जाने की भावना भरते हुए सागर निज़ामी लिखते हैं।

हुक्म आखिर क़त्लगाह में जब सुनाया जाएगा

जब मुझे फांसी के तख्ते पर चढ़ाया जाएगा,

ऐ वतन! उस वक्त भी मैं तेरे कने गाऊंगा

अहद करता हूं कि मैं तुझ पर फ़िदा हो जाऊंगा।

कवियों ने अपनी कविताओं में तरह-तरह से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है । यह ज़रूरी नहीं है कि हर कविता काव्यात्मक दृष्टि से भी श्रेष्ठ हो । वैसे भी जनभावनाओं को काव्यात्मकता की कसौटी पर कसना एक तरह से उन पर अन्याय ही होगा । मुख्य बात यही नहीं है कि ये कविताएं उस समय के जनाक्रोश को ही व्यक्त करती हैं और इसी कारण विदेशी सत्ता ने इन पर प्रतिबंध लगाया और इन्हें जस्त किया, बल्कि ये एक दौर का ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी हैं।

स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर ऐसी ही कुछ कविताओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। यह संग्रह उन कवियों, शायरों और देश पर बलिदान होने वाले सपूतों के प्रति एक विनम्र श्रद्धांजलि है।

इस संग्रह की सामग्री मुख्यत: समाजवादी शिक्षण संस्थान (अध्यक्ष चंद्रजीत यादव) तथा राष्ट्रीय अभिलेखागार द्वारा प्रकाशित पुस्तकों से ली गई है । अत: हम इनके आभारी हैं ।

 

विषय-सूची

1

ग़ज़ल

1

2

स्वतंत्र भारत

2

3

चलो जेलखाने

4

4

हुब्बे-वतन

6

5

भारत है जान हमारी

7

6

पंजाब का हत्याकांड

8

7

शहीदे-वतन की आरज़ू

10

8

मुक़द्दमा-ए-साज़िशे-लाहौर

11

9

भगतसिंह और दत्त

12

10

दार पर चढ़कर दिखा देंगे

14

11

स्वदेशी गाढ़ा

15

12

पैग़ामे-हयात

16

13

दीवाने बहुत

17

14

ऐ खुफ़्ताबख़्ते-हिंदी

18

15

वंदे मातरम

19

16

असेंबली में बम

20

17

दफ्तर की तलाशी

21

18

ऐ फ़िरंगी

22

19

ऐवाने-पार्लमेंट में गर्मागर्मी

23

20

कर देंगे ज़ालिमों का

25

 

अब बंद ज़ुल्म ढाना

 

21

लोरी

26

22

हिंदोस्तान

29

23

मां की दुआ

30

24

मन की भूल

31

25

शोरिशे-जुनूं

34

 

हम रहे, रहे न रहे

 

27

एक जलावतन की वापसी

36

 

गुलामी की खुसूसियात

38

28

लाएगा रंग एक दिन

39

 

खूने-खां हमारा

 

29

हिंदोस्तां हमारा

41

30

पयामे-हुर्रियत

42

31

तराना-ए-आज़ादी

43

32

वतन क़ैद से अब छुड़ाना पड़ेगा

45

33

यह निज़ामे-कुहना

47

34

शहाबे-साक़िब

50

35

देशभक्त का प्रलाप

51

36

खून की तड़प

52

37

मिस्टर दास बिस्तरे-मर्ग पर

53

38

मुझे गोलियों से उड़ा दिया

55

39

घर जला भाई का

57

40

हुब्बे-वतन

58

41

ग़ज़ल

59

42

इंक़लाब

60

43

झंडा महिमा

62

44

जज़्बाते-अख़्तर

63

45

भारत के लाल दोनों

65

46

ग़ज़ल दादरा चरखा

66

47

तख्त या तख्ता

68

48

नाल-ए-जरस

69

49

हिमाद्रि तुंग श्रृंग से

73

50

मैं उनके गीत गाता हूं

74

51

नारियों का प्रोत्साहन

76

52

शिकस्ते ज़िंदां का ख़्वाब

79

53

फुऱकते- 'दास'

80

54

निदा-ए-वक़्ते

82

55

चाहिए

84

56

ग़ज़ल

85

57

ज़ालिम से

86

58

आज़ादी या मौत

87

59

पयामे-बेदारी

89

60

सितम की इंतिहा क्या है

93

61

देश रक्षा के लिए

94

 

जान का जाना अच्छा

 

62

हम करेंगे या मरेंगे

95

63

मौत बेहतर है अगर

99

64

भारत के रहने वालो

100

65

छोड़ दे

102

66

खाके-हिंद

103

67

आज़ादी-ए-वतन

106

68

बेकसों का ईश्वर

108

69

कमख्वाब बे-फ़रोग़ है

109

70

पुष्प की अभिलाषा

111

71

हिंदुस्तानी आज़ाद

112

 

जमाअत का पैंफ्लेट

 

72

दावते-जंग

114

73

हिंदियों का राज

117

74

कड़े मरहले

119

75

मांझी

121

76

जवाके उठो

122

77

बेदारी-ए-मशरिक

124

78

सरफरोशी की तमन्ना

127

79

वीर बालिकाएं

128

80

भारत की आन

129

81

तराना-ए-आज़ादी

130

82

मैदाने-जंग में सुबह

132

83

ग़म नहीं है वार की

134

84

देश के हित जान जाए

135

 

तो भी घबड़ाना नहीं

 

85

विदा करो मां, जाते हैं हम

137

 

विजय ध्वजा फहराने

 

86

रक्षाबंधन

138

87

जवान जज़्बे

140

88

वक़्त बिताने को

141

89

एक शैदाए-वतन

143

 

के आदर्श विचार

 

90

कफ़न होगा हमारी

144

 

लाश पर

 

91

राष्ट्रीय झंडा

145

92

हिंदू-मुस्लिम एकता

147

93

युवकों की प्रतिज्ञा

148

94

जलियांवाला बाग

150

95

आगे बढ़ेंगे

151

96

मजबूरियां

153

97

अहद

154

98

शोला नवाई

156

99

'दास' की शहादत

157

100

घबराने से कुछ

158

 

हासिल नहीं

 

101

आज़ादी की देवी

160

102

देश की लाजा

165

 

झंडा झुकने न दो

 

103

जज़्बाते-नासिर

166

104

खादी गीत

167

105

धर्म

169

106

आज़ादी

170

107

प्यारा हिंदोस्तां हमारा

173

108

आज़ादी या मौत

174

109

निजाते-हिंद

175

110

क़ौम पे हम

176

 

हर चीज़ फ़िदा

 

111

हो गए तैयार अब

177

 

कुछ कर दिखाने के लिए

 

112

तरही पोलिटिकल

179

 

मुशायरा

 

 

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