Warning: include(domaintitles/domaintitle_cdn.exoticindia.php3): failed to open stream: No such file or directory in /home/exotic/newexotic/header.php3 on line 921

Warning: include(): Failed opening 'domaintitles/domaintitle_cdn.exoticindia.php3' for inclusion (include_path='.:/usr/lib/php:/usr/local/lib/php') in /home/exotic/newexotic/header.php3 on line 921

Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address [email protected].

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Best Deals
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Subscribe to our newsletter and discounts
कामयानी (Kamayani)
कामयानी (Kamayani)
Description

कामयानी

कामयानी अपने प्रकाशन से लेकार आज तक की अवधि में सर्वाधिक चर्चित ओर विवादास्पद पुस्तक रही है। लेकिन सारी अतिरेकी प्रशंसाओं तथा आलोचनाओं को आत्मसता करके वह केवल अपने स्थान पर निश्चल है बल्कि सुधी आलोचकों की दृष्टि में उत्तरोत्तर प्रासंगिक होती जा रही है।

कामयानी की कथा मूलत: एक फैंटेसी है, जिसका उपयोग प्रसादजी ने अपने समय की सामाजिक राष्ट्रवादी वास्तविकता के विश्लेषण कामयानी में प्रस्तुत हुआ है, वह आज भी उतना ही सच है जितना प्रसादजी के जमाने में था। मुक्तिबोध के शब्दों में, ``कामायनी में वर्णित सभ्यता-प्रयासों के पीछे, प्रसादजी का अपना जीवनानुभव, अपने युग की वास्तविक परिस्थिति, अपने समय की सामाजिक दशा बोल रही है।'' संक्षेप में, कामयानी एक ऐसा महाकाव्य है, जो आज के मानव-जीवन को उसके समस्त परिवेश और परिस्थिति के साथ प्रस्तुत करता है।

जीवन परिचय

जयशंकर प्रसाद

जन्म : 30 जनवरी 1890, वाराणसी (.प्र.) स्कूली शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा तक तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी, पालि और प्राकृत भाषाओं का अध्ययन इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण-कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय पिता देवीप्रसाद तंबाकू और सुँघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणसी में इनका परिवार 'सुँघनी साहू' के नाम से प्रसिद्ध था पिता के साथ बचपन से ही अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्राएँ की |

छायावादी कविता के चार प्रमुख उन्नायकों में से एक एक महान लेखक के रूप में। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन 48 वर्षो के छोटे-से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ

14 जनवरी 1937 को वाराणसी में निधन

आमुख

आर्य-साहित्य में मानवों के आदिपुरुष मनु का इतिहास वेदों से लेकर पुराण और इतिहासों में बिखरा हुआ मिलता है श्रद्धा और मनु के सहयोग से मानवता के विकास की कथा को, रूपक के आवरण में, चाहे पिल्ले काल में मान लेने का वैसा ही प्रयत्न हुआ हो जैसा कि सभी वैदिक इतिहासों के साथ निरुक्त के द्वारा किया गया, किन्तु मन्वन्तर के अर्थात् मानवता के नवयुग के प्रवर्त्तक के रूप में मनु की कथा आर्थो की अनुभूति में दृढ़ता से मानी गई है; इसलिए वैवस्वत मनु को ऐतिहासिक पुरुष ही मानना उचित है प्राय: लोग गाथा और इतिहास में मिथ्या और सत्य का व्यवधान मानते है किन्तु सत्य मिथ्या से अघिक विचित्र होता है आदिम चुग के मनुष्यों के प्रत्येक दल ने नोन्मेष के अरुणोदय में जो भावपूर्ण इतिवृत संग्रहीत किये थे, उन्हें आज गाथा या पौराणिक उपाख्यान कहकर उपख्यान कह कर अलग करदिया जाता है; क्योंकि उन चरित्रों के साथ भावनाओं का भी बीच-बीच में संबंध लगा हुआ-सा दीखता है घटनाएँ कहीं-कहीं अतिरंजित-सी अं मन पड़ती हैं तथ्थ-संग्रहकारिणी तर्कबुद्धि को ऐसी घटनाओं में रूपक का अरोप कर लेने की सुविधा हो जाती है किन्तु उनमें भी कुछ सत्यांश घटना से सम्बद्ध है, ऐसा तो मानना ही पड़ेगा आज के मनुष्य के समीप तो उसकी सीमा वर्तमान संस्कृति का -क्रमपूर्ण इतिहास ही होता है; परन्तु उसके इतिहास की सीमाजहाँ सें प्रारम्भ होती है, ठीक उसी के पहिले सामूहिक चेतना की दृढ़ दद्रु और गहरे रंगों की रेखाओं से, बीती हुई और भी पहिले बातों काउल्लेख स्मृति-पट पर अमिट रहता है; परन्तु कुछ अतिरंजित-सा वे घटनाएँ विचित्रता सेपूर्ण जान पड़ती है संभवत: इसीलिए हमको अपनी प्रचीन श्रुतियों कानिरुक्त के द्रारा अर्थ करना पड़ा; जिससे कि उन अर्थो का अपनी वर्तमान रुचि से सामंजस्य किया जाय

यदि श्रद्धा और मनु अर्थात् मनन के सहयोग से मानवता का विकास रूपक है, तो भी बड़ा ही भावमय और श्लाध्य है यह मुनुष्यता का मनौवैज्ञानिक इतिहास बनने में समर्थ हो सकता है आज हम सत्य का अर्थ घटना कर लेते है तब भी उसके तिथि-क्रम मात्र से संतुष्ट होकर, मनोवैज्ञानिक अन्वेषण कै द्वारा इतिहास की घटना के भीतर कुछ देखना

चाहते है उसके मूल में क्या रहस्य है? आत्मा की अनुभूति! ही, उसी भाव के रूप-ग्रहण की चेष्टा सत्य या घटना बनकर प्रत्यक्ष होती है फिर वे सत्य घटनाएँ स्थूल और क्षणिक होकर मिथ्या और अभाव में परिणत हो जाती है किन्तु सूक्ष्म अनुभूति या भाव 1 चिरंतन सत्य के रूप में प्रतिष्ठित रहता है, जिसके द्वारा युग-युग के पुरुषों की और पुरुषार्थो की

अभिव्यक्ति होती रहती है

 

जल-प्लावन भारतीय इतिहास में एक ऐसी प्राचीन घटना है, जिसने मनु को देवों से विलक्षण, मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया वह इतिहास ही है ' मनवे वै प्रातः' इत्यादि से इस घटना का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण के आठवें अध्याय में मिलता है देवगण के उच्छंखल स्वभाव, निर्बाध आत्मतुष्टि में अन्तिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात् श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को एक नये युग की सूचना मिली इस मन्वन्तर के प्रवर्त्तक मनु हुए मनु भारतीय इतिहास के आदिपुरुष है राम, कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं शतपथ

ब्राह्ण में उन्हें श्रद्धादेव कहा गया है ''श्रद्धादेवो वै मनु:' भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है

 

कामयानी (Kamayani)

Deal 20% Off
Item Code:
NZA224
Cover:
Paperback
Edition:
2012
ISBN:
9788171783212
Language:
Hindi
Size:
7.0 inch X 5.0 inch
Pages:
159
Other Details:
Weight of the Books: 140 gms
Price:
$7.00
Discounted:
$4.20   Shipping Free
You Save:
$2.80 (20% + 25%)
Be the first to rate this product
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
कामयानी (Kamayani)
From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 4888 times since 5th Nov, 2013

कामयानी

कामयानी अपने प्रकाशन से लेकार आज तक की अवधि में सर्वाधिक चर्चित ओर विवादास्पद पुस्तक रही है। लेकिन सारी अतिरेकी प्रशंसाओं तथा आलोचनाओं को आत्मसता करके वह केवल अपने स्थान पर निश्चल है बल्कि सुधी आलोचकों की दृष्टि में उत्तरोत्तर प्रासंगिक होती जा रही है।

कामयानी की कथा मूलत: एक फैंटेसी है, जिसका उपयोग प्रसादजी ने अपने समय की सामाजिक राष्ट्रवादी वास्तविकता के विश्लेषण कामयानी में प्रस्तुत हुआ है, वह आज भी उतना ही सच है जितना प्रसादजी के जमाने में था। मुक्तिबोध के शब्दों में, ``कामायनी में वर्णित सभ्यता-प्रयासों के पीछे, प्रसादजी का अपना जीवनानुभव, अपने युग की वास्तविक परिस्थिति, अपने समय की सामाजिक दशा बोल रही है।'' संक्षेप में, कामयानी एक ऐसा महाकाव्य है, जो आज के मानव-जीवन को उसके समस्त परिवेश और परिस्थिति के साथ प्रस्तुत करता है।

जीवन परिचय

जयशंकर प्रसाद

जन्म : 30 जनवरी 1890, वाराणसी (.प्र.) स्कूली शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा तक तत्पश्चात् घर पर ही संस्कृत, अंग्रेजी, पालि और प्राकृत भाषाओं का अध्ययन इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण-कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय पिता देवीप्रसाद तंबाकू और सुँघनी का व्यवसाय करते थे और वाराणसी में इनका परिवार 'सुँघनी साहू' के नाम से प्रसिद्ध था पिता के साथ बचपन से ही अनेक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों की यात्राएँ की |

छायावादी कविता के चार प्रमुख उन्नायकों में से एक एक महान लेखक के रूप में। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करुणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन 48 वर्षो के छोटे-से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएँ

14 जनवरी 1937 को वाराणसी में निधन

आमुख

आर्य-साहित्य में मानवों के आदिपुरुष मनु का इतिहास वेदों से लेकर पुराण और इतिहासों में बिखरा हुआ मिलता है श्रद्धा और मनु के सहयोग से मानवता के विकास की कथा को, रूपक के आवरण में, चाहे पिल्ले काल में मान लेने का वैसा ही प्रयत्न हुआ हो जैसा कि सभी वैदिक इतिहासों के साथ निरुक्त के द्वारा किया गया, किन्तु मन्वन्तर के अर्थात् मानवता के नवयुग के प्रवर्त्तक के रूप में मनु की कथा आर्थो की अनुभूति में दृढ़ता से मानी गई है; इसलिए वैवस्वत मनु को ऐतिहासिक पुरुष ही मानना उचित है प्राय: लोग गाथा और इतिहास में मिथ्या और सत्य का व्यवधान मानते है किन्तु सत्य मिथ्या से अघिक विचित्र होता है आदिम चुग के मनुष्यों के प्रत्येक दल ने नोन्मेष के अरुणोदय में जो भावपूर्ण इतिवृत संग्रहीत किये थे, उन्हें आज गाथा या पौराणिक उपाख्यान कहकर उपख्यान कह कर अलग करदिया जाता है; क्योंकि उन चरित्रों के साथ भावनाओं का भी बीच-बीच में संबंध लगा हुआ-सा दीखता है घटनाएँ कहीं-कहीं अतिरंजित-सी अं मन पड़ती हैं तथ्थ-संग्रहकारिणी तर्कबुद्धि को ऐसी घटनाओं में रूपक का अरोप कर लेने की सुविधा हो जाती है किन्तु उनमें भी कुछ सत्यांश घटना से सम्बद्ध है, ऐसा तो मानना ही पड़ेगा आज के मनुष्य के समीप तो उसकी सीमा वर्तमान संस्कृति का -क्रमपूर्ण इतिहास ही होता है; परन्तु उसके इतिहास की सीमाजहाँ सें प्रारम्भ होती है, ठीक उसी के पहिले सामूहिक चेतना की दृढ़ दद्रु और गहरे रंगों की रेखाओं से, बीती हुई और भी पहिले बातों काउल्लेख स्मृति-पट पर अमिट रहता है; परन्तु कुछ अतिरंजित-सा वे घटनाएँ विचित्रता सेपूर्ण जान पड़ती है संभवत: इसीलिए हमको अपनी प्रचीन श्रुतियों कानिरुक्त के द्रारा अर्थ करना पड़ा; जिससे कि उन अर्थो का अपनी वर्तमान रुचि से सामंजस्य किया जाय

यदि श्रद्धा और मनु अर्थात् मनन के सहयोग से मानवता का विकास रूपक है, तो भी बड़ा ही भावमय और श्लाध्य है यह मुनुष्यता का मनौवैज्ञानिक इतिहास बनने में समर्थ हो सकता है आज हम सत्य का अर्थ घटना कर लेते है तब भी उसके तिथि-क्रम मात्र से संतुष्ट होकर, मनोवैज्ञानिक अन्वेषण कै द्वारा इतिहास की घटना के भीतर कुछ देखना

चाहते है उसके मूल में क्या रहस्य है? आत्मा की अनुभूति! ही, उसी भाव के रूप-ग्रहण की चेष्टा सत्य या घटना बनकर प्रत्यक्ष होती है फिर वे सत्य घटनाएँ स्थूल और क्षणिक होकर मिथ्या और अभाव में परिणत हो जाती है किन्तु सूक्ष्म अनुभूति या भाव 1 चिरंतन सत्य के रूप में प्रतिष्ठित रहता है, जिसके द्वारा युग-युग के पुरुषों की और पुरुषार्थो की

अभिव्यक्ति होती रहती है

 

जल-प्लावन भारतीय इतिहास में एक ऐसी प्राचीन घटना है, जिसने मनु को देवों से विलक्षण, मानवों की एक भिन्न संस्कृति प्रतिष्ठित करने का अवसर दिया वह इतिहास ही है ' मनवे वै प्रातः' इत्यादि से इस घटना का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण के आठवें अध्याय में मिलता है देवगण के उच्छंखल स्वभाव, निर्बाध आत्मतुष्टि में अन्तिम अध्याय लगा और मानवीय भाव अर्थात् श्रद्धा और मनन का समन्वय होकर प्राणी को एक नये युग की सूचना मिली इस मन्वन्तर के प्रवर्त्तक मनु हुए मनु भारतीय इतिहास के आदिपुरुष है राम, कृष्ण और बुद्ध इन्हीं के वंशज हैं शतपथ

ब्राह्ण में उन्हें श्रद्धादेव कहा गया है ''श्रद्धादेवो वै मनु:' भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारम्भ माना गया है

 

Post a Comment
 
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy
Based on your browsing history
Loading... Please wait

Items Related to कामयानी (Kamayani) (Language and Literature | Books)

Kamayani (Hindi Text with English Translation)
Item Code: NAF806
$43.00$32.25
You save: $10.75 (25%)
Add to Cart
Buy Now
कामायनी: Kamayani
Deal 20% Off
Item Code: NZF808
$29.00$17.40
You save: $11.60 (20 + 25%)
Add to Cart
Buy Now
Jayashankar Prasad His Mind and Art
by Dr. Nagendra
Hardcover (Edition: 1989)
Prabhat Prakashan
Item Code: IDJ796
$15.00$11.25
You save: $3.75 (25%)
SOLD
Testimonials
I am so happy to have found you!! What a wonderful source for books of Indian origin at reasonable cost! Thank you!
Urvi, USA
I very much appreciate your web site and the products you have available. I especially like the ancient cookbooks you have and am always looking for others here to share with my friends.
Sam, USA
Very good service thank you. Keep up the good work !
Charles, Switzerland
Namaste! Thank you for your kind assistance! I would like to inform that your package arrived today and all is very well. I appreciate all your support and definitively will continue ordering form your company again in the near future!
Lizette, Puerto Rico
I just wanted to thank you again, mere dost, for shipping the Nataraj. We now have it in our home, thanks to you and Exotic India. We are most grateful. Bahut dhanyavad!
Drea and Kalinidi, Ireland
I am extremely very happy to see an Indian website providing arts, crafts and books from all over India and dispatching to all over the world ! Great work, keep it going. Looking forward to more and more purchase from you. Thank you for your service.
Vrunda
We have always enjoyed your products.
Elizabeth, USA
Thank you for the prompt delivery of the bowl, which I am very satisfied with.
Frans, the Netherlands
I have received my books and they are in perfect condition. You provide excellent service to your customers, DHL too, and I thank you for that. I recommended you to my friend who is the director of the Aurobindo bookstore.
Mr. Forget from Montreal
Thank you so much. Your service is amazing. 
Kiran, USA
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2020 © Exotic India