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कुरु - कुरु स्वाहा (Kuru Kuru Swaha)

कुरु- कुरु स्वाहा...

 

नाम बेढब, शैली बेडौल, कथानक बेपैंदे का । कुल मिलाकर बेजोड़ बकवास । अब यह पाठक पर है कि 'बकवास' को 'एब्सर्ड' का पर्याय माने या न माने । पहले शॉट से लेकर फाइनल फ्रीज तक यह एक कॉमेडी है, लेकिन इसी के एक पात्र के शब्दों में : ' 'एइसा कॉमेडी कि दर्शिक लोग जानेगा, केतना हास्यास्पद है त्रास अउर केतना त्रासद है हास्य । ''

उपन्यास का नायक है मनोहर श्याम जोशी, जो इस उपन्यास के लेखक मनोहर श्याम जोशी के अनुसार सर्वथा कल्पित पात्र है । यह नायक तिमंजिला है । पहली मंजिल में बसा है मनोहर-श्रद्धालु-भावुक किशोर । दूसरी मंजिल में 'जोशीजी' नामक इंण्टेलेक्चुअल और तीसरी में दुनियादार श्रद्धालु 'मैं' जो इस कथा को सुना रहा है । नायिका है पहुँचेली-एक अनाम और अबूझ पहेली, जो इस तिमंजिला नायक को धराशायी करने के लिए ही अवतरित हुई है ।

नायक-नायिका के चारों ओर है बम्बई का बुद्धिजीवी और अपराधजीवी जगत ।

'कुरु-कुरु स्वाहा' में कई-कई कथानक होते हुए भी कोई कथानक नहीं है, भाषा और शिल्प के कई-कई तेवर होते हुए भी कोई तेवर नहीं है, आधुनिकता और परम्परा की तमाम अनुगूँजें होते हुए भी कहीं कोई वादी-संवादी स्वर नहीं है । यह एक ऐसा उपन्यास है, जो स्वयं को नकारता ही चला जाता है ।.

 

जीवन परिचय

मनोहर श्याम जोशी

9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी 'कल के वैज्ञानिक' की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्र- जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गए । अमृतलाल नागर और अज्ञेय-इन दो आचार्यो का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ । स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद 21वे वर्ष से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गए ।

प्रेस, रेडियो, टी.वी. वृत्तचित्र, विज्ञापन-सम्प्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो । खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक कोई ऐसा विषय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो । आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता रहा है । पहली कहानी तब छपी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्ष के होने को आए ।

केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए '67 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया । टेलीविजन धारावाहिक 'हम लोग' लिखने के लिए सन् '84 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं ।

प्रकाशित पुस्तकें: कुरु-कुरु स्वाहा..., कसप हरिया हरगलीज की हैरानी हमज़ाद ट-टा प्रोफेसर क्याप (उपन्यास); नेताजी कहिन (व्यंग्य संग्रह); बातों-बातों में  (साक्षात्कार); एक दुर्लभ व्यक्तित्व कैसे किस्सागो मन्दिर घाट की पैड़ियाँ (कहानी-संग्रह); पटकथा लेखन एक परिचय (मीडिया) । टेलीविजन धारावाहिक : हम लोग बुनियाद मुंगेरीलाल के हसीन सपने कक्काजी कहिन हमराही जमीन-आसमान और गाथा फिल्म : भ्रष्टाचार अणु राजा हे राम और निर्माणाधीन जमीन ।

आवरण-चित्र: रामकुमार

जन्म:1924, शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय; कला शिक्षण : दिल्ली तथा पेरिस में । शिमला, दिल्ली, मुम्बई, प्राग, वारसा, लंदन तथा बुदापेस्त आदि नगरों में एकल तथा विश्व की अनेक प्रतिष्ठित गैलरियों में सामूहिक प्रदर्शनियाँ ।

सम्मान : नेशनल अवार्ड, नई दिल्ली; ओनरेबल मैंशन, साओ पाओलो बाइनेल जे.डी. रॉकफेलर थर्ड फेलोशिप, न्यूयॉर्क; भारत सरकार द्वारा पद्मश्री; कालिदास सम्मान, भोपाल; आदि ।

रामकुमार प्रतिष्ठित कथाकार भी हैं ।

 

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