Warning: include(domaintitles/domaintitle_cdn.exoticindia.php3): failed to open stream: No such file or directory in /home/exotic/newexotic/header.php3 on line 921

Warning: include(): Failed opening 'domaintitles/domaintitle_cdn.exoticindia.php3' for inclusion (include_path='.:/usr/lib/php:/usr/local/lib/php') in /home/exotic/newexotic/header.php3 on line 921

Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address [email protected].

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Best Deals
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Language and Literature > हिन्दी साहित्य > रसमंजरी: Rasmanjari (A Book on Rasas)
Subscribe to our newsletter and discounts
रसमंजरी: Rasmanjari (A Book on Rasas)
Pages from the book
रसमंजरी: Rasmanjari (A Book on Rasas)
Look Inside the Book
Description

सम्पादकीय

 

रसो वै सः के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड रसरूप परमात्मा से आप्लावित है । परमात्मरस से हीन ब्रह्माण्ड प्राणतत्त्वविहीन, निःसार और नीरस है । परमात्मा के सृष्टि की रचना भी सरसता के लिए हुई है जैसा कि शतपथब्राह्मण में निर्दिष्ट है- एकोऽहं बहु स्याम एकाकी न रमते । इसलिए रमण करने के लिए सरसता आवश्यक तत्त्व है । रसविहीन होने पर सृष्टिप्रक्रिया बाधित हो जाएगी । सृष्टिप्रक्रिया के अविरल प्रवर्तन के लिए रस की उपादेयता स्वत: सिद्ध है ।

काव्यकर्त्ता कवि भी अपने काव्य की रचना करने में सृष्टिकर्त्ता से कम नहीं है । वह अपने काव्य में रस की धारा प्रवाहित करने के लिए अथक प्रयत्न करता है; क्योंकि रसविहीन काव्य रसिक-सहृदयों को प्रभावित नहीं कर सकता है । इसलिए काव्य-जगत् में रस की महत्ता सर्वजनीन है । लौकिक काव्य ही नहीं, प्रत्युत अपौरुषेय होतै हुए भी वैदिक-काव्य संहिताएँ भी इसका अपवाद नहीं हैं । रससिक्तता वेदों में भी स्थल-स्थल पर विराजमान दृष्टिगोचर होती है !

रस के विषय में चिन्तन और मनन की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है । रस के विषय में अनेक चिन्तक-आचार्यों ने अपनी दृष्टि से विचार किया और उसको लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया । कतिपय आचार्यों ने तो रस को अलौकिक तत्व के रूप में व्याख्यायित किया और उसका सम्बन्ध परमात्मा से स्थापित किया किन्तु काव्य के क्षेत्र में रसचिन्तक के रूप में भरतमुनि का नाम अग्रगण्य माना जाता है । यद्यपि काव्यशास्त्र के क्षेत्र में अनेक मत-मतान्तर हें-रससम्प्रदाय, अलङ्कारसम्प्रदाय, रीतिसम्प्रदाय, वक्रोक्तिसम्प्रदाय एवं ध्वनिसम्प्रदाय तथापि रस का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में सभी सम्प्रदायों में स्थापित किया गया है; क्योंकि रस से विहीन काव्य सहृदयों को उस रूप में नहीं प्रभावित कर सकता जितना अधिक सरस काव्य । इसलिए सभी काव्यशास्त्री रस के विषय में विचार करने के लिए बाध्य हैं ।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि आचार्य भरत रससम्प्रदाय के आदि आचार्य माने जाते हैं । यद्यपि भरत के बाद रस -खट्ट विषय में अनेकानेक आचार्यों ने चिन्तन करके अपने मत का उद्घाटन किया किन्तु सभी आचार्या का आधार भरत का रस-सिद्धान्त ही रहा- विभावानुभावसञ्चारियोगाद्रसनिष्पत्ति:

इसी परम्परा में भानुदत्तकृत रसमञ्जरी भी है । इस ग्रन्थ में शास्त्रकार ने विभाव के दो भेदों में आलम्बन और उद्दीपन में से श्रृङ्गार रस के आलम्बन विभाव-नायिका और नायक का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है । इसमें नायिका और नायक के भेदोपभेद का सम्यक् रूप से सोदाहरण लक्षण निरूपित है । भानुदत्त के दो ग्रन्यों- रसमञ्जरी और रसतरङ्गिणी में रसमञ्जरी अधिक ख्यातिलब्ध है । इसकी ख्यातिलब्धता इस पन्य पर की गयी ग्यारह टीकाओं से ही स्पष्ट है ।

ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की आज तक कोई हिन्दी व्याख्या नहीं हो पायी थी । इसी अभाव की पूर्ति के लिए इस संस्करण में मेरे अनुजकल्प सुहद् डॉ ० कृष्णदत्त मिश्र, रीडर संस्कृत विभाग, महात्मा गान्धी काशी विद्यापीठ ने अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक शोध करके हिन्दी और संस्कृत में इसका व्याख्यान प्रस्तुत किया है । विषयवस्तु को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने विशेष को जोड़कर ग्रन्थ को महदुपयोगी बना दिया है । इस प्रकार यह सुधी पाठकों के लिए सरल हो जाएगा; ऐसी आशा है ।

Sample Pages






रसमंजरी: Rasmanjari (A Book on Rasas)

Item Code:
HAA028
Cover:
Paperback
Edition:
2011
Language:
Sanskrit Text with Hindi Translation
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
160
Other Details:
Weight of the Book: 170 gms
Price:
$13.00   Shipping Free
Look Inside the Book
Be the first to rate this product
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
रसमंजरी: Rasmanjari (A Book on Rasas)
From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 13486 times since 7th Apr, 2019

सम्पादकीय

 

रसो वै सः के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड रसरूप परमात्मा से आप्लावित है । परमात्मरस से हीन ब्रह्माण्ड प्राणतत्त्वविहीन, निःसार और नीरस है । परमात्मा के सृष्टि की रचना भी सरसता के लिए हुई है जैसा कि शतपथब्राह्मण में निर्दिष्ट है- एकोऽहं बहु स्याम एकाकी न रमते । इसलिए रमण करने के लिए सरसता आवश्यक तत्त्व है । रसविहीन होने पर सृष्टिप्रक्रिया बाधित हो जाएगी । सृष्टिप्रक्रिया के अविरल प्रवर्तन के लिए रस की उपादेयता स्वत: सिद्ध है ।

काव्यकर्त्ता कवि भी अपने काव्य की रचना करने में सृष्टिकर्त्ता से कम नहीं है । वह अपने काव्य में रस की धारा प्रवाहित करने के लिए अथक प्रयत्न करता है; क्योंकि रसविहीन काव्य रसिक-सहृदयों को प्रभावित नहीं कर सकता है । इसलिए काव्य-जगत् में रस की महत्ता सर्वजनीन है । लौकिक काव्य ही नहीं, प्रत्युत अपौरुषेय होतै हुए भी वैदिक-काव्य संहिताएँ भी इसका अपवाद नहीं हैं । रससिक्तता वेदों में भी स्थल-स्थल पर विराजमान दृष्टिगोचर होती है !

रस के विषय में चिन्तन और मनन की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है । रस के विषय में अनेक चिन्तक-आचार्यों ने अपनी दृष्टि से विचार किया और उसको लोगों के सम्मुख प्रस्तुत किया । कतिपय आचार्यों ने तो रस को अलौकिक तत्व के रूप में व्याख्यायित किया और उसका सम्बन्ध परमात्मा से स्थापित किया किन्तु काव्य के क्षेत्र में रसचिन्तक के रूप में भरतमुनि का नाम अग्रगण्य माना जाता है । यद्यपि काव्यशास्त्र के क्षेत्र में अनेक मत-मतान्तर हें-रससम्प्रदाय, अलङ्कारसम्प्रदाय, रीतिसम्प्रदाय, वक्रोक्तिसम्प्रदाय एवं ध्वनिसम्प्रदाय तथापि रस का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में सभी सम्प्रदायों में स्थापित किया गया है; क्योंकि रस से विहीन काव्य सहृदयों को उस रूप में नहीं प्रभावित कर सकता जितना अधिक सरस काव्य । इसलिए सभी काव्यशास्त्री रस के विषय में विचार करने के लिए बाध्य हैं ।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि आचार्य भरत रससम्प्रदाय के आदि आचार्य माने जाते हैं । यद्यपि भरत के बाद रस -खट्ट विषय में अनेकानेक आचार्यों ने चिन्तन करके अपने मत का उद्घाटन किया किन्तु सभी आचार्या का आधार भरत का रस-सिद्धान्त ही रहा- विभावानुभावसञ्चारियोगाद्रसनिष्पत्ति:

इसी परम्परा में भानुदत्तकृत रसमञ्जरी भी है । इस ग्रन्थ में शास्त्रकार ने विभाव के दो भेदों में आलम्बन और उद्दीपन में से श्रृङ्गार रस के आलम्बन विभाव-नायिका और नायक का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है । इसमें नायिका और नायक के भेदोपभेद का सम्यक् रूप से सोदाहरण लक्षण निरूपित है । भानुदत्त के दो ग्रन्यों- रसमञ्जरी और रसतरङ्गिणी में रसमञ्जरी अधिक ख्यातिलब्ध है । इसकी ख्यातिलब्धता इस पन्य पर की गयी ग्यारह टीकाओं से ही स्पष्ट है ।

ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की आज तक कोई हिन्दी व्याख्या नहीं हो पायी थी । इसी अभाव की पूर्ति के लिए इस संस्करण में मेरे अनुजकल्प सुहद् डॉ ० कृष्णदत्त मिश्र, रीडर संस्कृत विभाग, महात्मा गान्धी काशी विद्यापीठ ने अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक शोध करके हिन्दी और संस्कृत में इसका व्याख्यान प्रस्तुत किया है । विषयवस्तु को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने विशेष को जोड़कर ग्रन्थ को महदुपयोगी बना दिया है । इस प्रकार यह सुधी पाठकों के लिए सरल हो जाएगा; ऐसी आशा है ।

Sample Pages






Post a Comment
 
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy
Based on your browsing history
Loading... Please wait

Items Related to रसमंजरी: Rasmanjari (A Book on Rasas) (Language and Literature | Books)

The Concepts of Rasa (With Special Reference to Abhinavagupta)
Item Code: IHE086
$31.00
Add to Cart
Buy Now
A Rasa Reader - Classical Indian Aesthetics
by Sheldon Pollock
Hardcover (Edition: 2017)
Permanent Black
Item Code: NAH790
$62.00
Add to Cart
Buy Now
Versified History of Sanskrit Poetics: The Soul is Rasa
by Gaurapada Dasa
Hardcover (Edition: 2017)
Ras Bihari Lal and Sons
Item Code: NAN691
$47.00
Add to Cart
Buy Now
Reign of Rasa in Sanskrit Criticism
Item Code: NAH446
$21.00
Add to Cart
Buy Now
The Number of Rasa-s
Item Code: IDH334
$35.00
Add to Cart
Buy Now
Transformation of Poetic Discourse (In Rasa and Post-structural Poetics)
Deal 20% Off
by Vandana Rajoriya
Hardcover (Edition: 2012)
D. K. Printworld Pvt. Ltd.
Item Code: NAD359
$31.00$24.80
You save: $6.20 (20%)
Add to Cart
Buy Now
रसखान के श्रृंगारपद: Love Songs of Rasakhan
Deal 20% Off
by Harsha V. Dehejia
Paperback (Edition: 2018)
D. K. Printworld Pvt. Ltd.
Item Code: NAO075
$36.00$28.80
You save: $7.20 (20%)
Add to Cart
Buy Now
Testimonials
I’ve started receiving many of the books I’ve ordered and every single one of them (thus far) has been fantastic - both the books themselves, and the execution of the shipping. Safe to say I’ll be ordering many more books from your website :)
Hithesh, USA
I have received the book Evolution II.  Thank you so much for all of your assistance in making this book available to me.  You have been so helpful and kind.
Colleen, USA
Thanks Exotic India, I just received a set of two volume books: Brahmasutra Catuhsutri Sankara Bhasyam
I Gede Tunas
You guys are beyond amazing. The books you provide not many places have and I for one am so thankful to have found you.
Lulian, UK
This is my first purchase from Exotic India and its really good to have such store with online buying option. Thanks, looking ahead to purchase many more such exotic product from you.
Probir, UAE
I received the kaftan today via FedEx. Your care in sending the order, packaging and methods, are exquisite. You have dressed my body in comfort and fashion for my constrained quarantine in the several kaftans ordered in the last 6 months. And I gifted my sister with one of the orders. So pleased to have made a connection with you.
EB Cuya FIGG, USA
Thank you for your wonderful service and amazing book selection. We are long time customers and have never been disappointed by your great store. Thank you and we will continue to shop at your store
Michael, USA
I am extremely happy with the two I have already received!
Robert, UK
I have just received the top and it is beautiful 
Parvathi, Malaysia
I received ordered books in perfect condition. Thank You!
Vladimirs, Sweden
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2021 © Exotic India