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Books > Hindu > हिन्दी > गहरे पानी पैठ: Penetrating Deep Waters
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गहरे पानी पैठ: Penetrating Deep Waters
गहरे पानी पैठ: Penetrating Deep Waters
Description

पुस्तक के विषय में

तीर्थ है, मंदिर है, उनका सारा का सारा विज्ञान है । और उस पूरे विज्ञान की अपनी सूत्रबद्ध प्रक्रिया है । एक कदम उठाने से दूसरा कदम उठता है, दूसरा उठाने से तीसरा उठता है, तीसरा से चौथा उठता है, और परिणाम होता है । एक भी कदम बीच में खो जाए एक भी सूत्र बीच में खो जाए तो परिणाम नहीं होता ।

जिन गुप्त तीर्थों की मैं बात कर रहा हूं उनके द्वार हैं, उन तक पहुंचने की व्यवस्थाएं हैं, लेकिन उन सबके आंतरिक सूत्र हैं । इन तीर्थों में ऐसा सारा इंतजाम है कि जिनका उपयोग करके चेतना गतिमान हो सके ।

पुस्तक के अन्य विषय-बिंदु :-

मंदिर के आंतरिक अर्थ

तीर्थ : परम की गुह्य यात्रा

तिलक-टीके : तृतीय नेत्र की अभिव्यंजना

मूर्ति-पूजा : मूर्त से अमूर्त की ओर

एक तो होता है कि हम नाव में पतवार लगा कर और नाव को खेवें; दूसरा यह होता है कि हम पतवार तो चलाएं ही न, नाव के पाल खोल दें और उचित समय पर और उचित हवा की दिशा में नाव को बहने दें । तो तीर्थ वैसी जगह थी जहां से कि चेतना की एक धारा अपने आप प्रवाहित हो रही है, जिसको प्रवाहित करने के लिए सदियों ने मेहनत की है । आप सिर्फ उस धारा में खड़े हो जाएं तो आपकी चेतना का पाल तन जाए और आप एक यात्रा पर निकल जाएं । जितनी मेहनत आपको अकेले में करनी पड़े, उससे बहुत अल्प मेहनत में यात्रा संभव हो सकती है ।

हमारी यह सदी बहुत अर्थों में कई तरह की मूढ़ताओं की सदी है । और हमारी मूढ़ता का जो सबसे बड़ा आधार है वह निषेध है । पूरी सदी कुछ भी इनकार किए चली जाती है । और दूसरे भी सिद्ध नहीं कर पाते, तब फिर वे भी निषेध की धारा में खड़े हो जाते हैं । लेकिन ध्यान रहे, जितना निषेधात्मक होगा जीवन, उतना ही क्षुद्र हो जाएगा । क्योंकि इस जगत का कोई भी सत्य विधेयक हुए बिना उपलब्ध नहीं होता है । जितना निषेधात्मक होगा जीवन, उतना बुद्धिमान भला दिखाई पड़े, भीतर बहुत बुद्धिहीन हो जाएगा । जितना निषेधात्मक होगा जीवन, उतनी ही सत्य की, सौंदर्य की, आनंद की किसी अनुभूति की किरण भी नहीं उतरेगी । क्योंकि कोई भी महत्तर अनुभव विधायक चित्त में अवतरित होता है । निषेधात्मक चित्त में कोई भी महत्वपूर्ण अनुभव अवतरित नहीं होता ।...

जो हृदय इस पूरे जीवन को हा कहने के लिए तैयार हो जाए वह आस्तिक है । आस्तिकता का अर्थ ईश्वर को हा कहना नहीं, हा कहने की क्षमता है । नास्तिक का अर्थ ईश्वर को इनकार करना नहीं, नास्तिक का अर्थ न के अतिरिक्त किसी भी क्षमता का न होना है ।

प्रवेश से पूर्व

जैंसे हाथ में चाबी हो, चाबी को हम कुछ भी सीधा जानने का उपाय करे, चाबी से ही चाबी को समझना चाहे, तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता-उस चाबी की खोज-बीन से-कि कोई बडा खजाना उससे हाथ लग सकता है चाबी में ऐसी कोई भी सूचना नही है जिससे छिपे हुए खजाने का पता लगे । चाबी अपने में बिलकुल बंद है । चाबी को हम तोड़े- फोडें, काटे-लोहा हाथ लगे, और धातुएं हाथ लगजाएं-उस खजाने की कोई खबर हाथ न लगेगी, जो चाबी से मिल सकता है।

मंदिर है । पृथ्वी पर ऐसी एक भी जाति नही है जिसने मंदिर जैसी कोई चीज निर्मित न की हो । वह उसे मस्जिद कहती हो, चर्च कहती हो, गुरुद्वारा कहती हो, इससे बहुत प्रयोजन नहीं है । पृथ्वी पर ऐसी एक भी जाति नही है जिसने मंदिर जैसी कोई चीज निर्मित न कीं हो और आज तो यह संभव है कि हम एक-दूसरी जातियों से सीख ले एक वक्त था, जब दूसरी जातियां है भी, यह भी हमें पता नहीं था । तो मंदिर कोई ऐसी चीज नही है, जो बाहर से किन्ही कल्पना करने वाले लोगो ने खडी कर ली हो । मनुष्य की चेतना से ही निकली हुई कोई चीज है कितने ही टूर, कितने ही एकांत में, पर्वत में पहाड़ में, झील पर बसा हुआ मनुष्य हो, उसने मंदिर जैसा कुछ जरूर निर्मित किया है । तो मनुष्य की चेतना से ही कुछ निकल रहा है अनुकरण नहीं है, एक-दूसरे को देख कर कुछ निर्मित नही हो गया है इसलिए विभिन्न तरह के मंदिर बने, लेकिन मंदिर बने है बहुत फर्क है एक मस्जिद में और एक मंदिर में उनकी व्यवस्था में बहुत फर्क है उनकी योजना में बहुत फर्क है । लेकिन आकांक्षा में फर्क नहीं है, अभीप्सा में फर्क नहीं है ।

पहले तो मंदिर को बनाने की जो जागतिक कल्पना है समस्त जगत में, सिर्फ मनुष्य है जो मंदिर बनाता है । घर तो पशु भी बनाते है, घोसले तो पक्षी भी बनाते है, लेकिन मंदिर नहीं बनाते मनुष्य की जो भेद-रेखा खीची जाए पशुओं से, उसमें यह भी लिखना ही पडेगा कि वह मंदिर बनाने वाला प्राणी है । कोई दूसरा मंदिर नही बनाता । अपने लिए आवास तो बिलकुल ही स्वाभाविक है । अपने रहने की जगह तो कोई भी बनाता है । छोटे-छोटे कीड़े भी बनाते है, पक्षी भी बनाते है, पशु भी बनाते है । लेकिन परमात्मा के लिए आवास मनुष्य का जागतिक लक्षण है । परमात्मा के लिए भी आवास, उसके लिए भी कोई जगह बनाना । परमात्मा के गहन बोध के अतिरिक्त मंदिर नहीं बनाया जा सकता । फिर परमात्मा का गहन बोध भी खो जाए तो मंदिर बचा रहेगा, लेकिन बनाया नहीं जा सकता बिना बोध के । आपने एक अतिथि-गृह बनाया घर में, वह अतिथि आते रहे होगे तभी । अतिथि न आते हो तो आप अतिथि-गृह नहीं बनाने वाले है । हालाकि यह हो सकता है कि अब अतिथि न आते हो तो अतिथि-गृह खडा रह जाए ।

भारत पुन कभी भारत नही हो सकता जब तक उसका मंदिर जीवंत न हो जाए-कभी पुन भारत नहीं हो सकता । उसकी सारी कीमिया सारी अल्केमी ही मंदिर में थी जहा से उसने सबकुछ लिया था । चाहे बीमार हुआ हो तो मंदिर भाग कर गया था, चाहे दुखी हुआ हो तो मंदिर भाग कर गया था, चाहे सुखी हुआ हो तो मंदिर धन्यवाद देने गया था । घर में खुशी आई हो तो मंदिर मे प्रसाद चढा आया था, घर मे तकलीफ आई हो तो मंदिर में निवेदन कर आया था । सब-कुछ उसका मंदिर था । सारी आशाएं सारी आकांक्षाएं सारी अभीप्साए उसके मंदिर के आस-पास थी । खुद कितना ही दीन रहा हो, मंदिर को उसने सोने और हीरे-जवाहरातों से सजा रखा था ।

आज दाब हम सिर्फ सोचने बैठते है तो यह बिलकुल पागलपन मालूम पडता है कि आदमी भूखा मर रहा है-यह मंदिर को हटाओ, एक अस्पताल बना दो । एक स्कूल खोल दो । इसमे शरणार्थी ही ठहरा दो । इस मंदिर का कुछ उपयोग कर लो। क्योंकि मंदिर का उपयोग हमें पता नही है, इसलिए वह बिलकुल निरुपयोगी मालूम हो रहा है, उसमे कुछ भी तो नही है । अरि मंदिर में क्या जरूरत है सोने की, और मंदिर में क्या जरूरत है हीरो की, जब कि लोग भूखे मर रहे है ।

लेकिन भूखे मरने वाले लोगो ने ही मंदिर मे हीरा और सोना बहुत दिन से लगा रखा था । उसके कुछ कारण थे । जो भी उनके पास श्रेष्ठ था वह मंदिर मे रख आए थे क्योकि जो भी उन्होने श्रेष्ठ जाना था वह मंदिर से ही जाना था । इसके उत्तर मे उनके पास कुछ देने को नही था । न सोना कुछ उत्तर था, न हीरे कोई उत्तर थे । लेकिन जो मिला था मंदिर से, उसका हम कुछ और भी तो वहा नही दे सकते थे वहा कुछ धन्यवाद देने को भी नहीं था । तो जो भी था वह हम वहा रख आए थे अकारण नही था वह । लाखो साल तक अकारण कुछ नहीं चलता । इस मंदिर के बाहर ये तो उसके आविष्ट रूप के अदृश्य परिणाम थे, जो चौबीस घटे तरगायित होते रहत थे । उसके चेतन परिणाम भी थे । उसके चेतन परिणाम बहुत सीधे-साफ थे ।

आदमी को निरंतर विस्मरण है । वह सब जो महान है विस्मृत हो जाता है, और जा सब क्षुद्र है, चौबीस घटे याद आता है । परमात्मा को याद रखना पडता है, वासना को याद रखना नही पडता, वह याद आती है । गढ़डे मे उतर जाने में कोई कठिनाई नही होती, पहाड़ चढने मे कठिनाई होती है । तो मंदिर गांव के बीच मे निर्मित करते थे कि दिन मे दस बार आते-जाते मंदिर किसी और एक आकांक्षा को भी जगाए रखे।...

यह आपके लिए चौबीस घटे आकांक्षा का एक नया स्रोत बना रहता है ।

एक और द्वार भी है जीवन मे दुकान और घर ही नहीं, धन और स्त्री ही नही-एक और द्वार भी है जीवन मे जो न बाजार का हिस्सा है, न वासना का हिस्सा हे, न धन मिलता है वह।, न यश मिलता है वहा, न काम-तृप्ति होती है वहा । एक जगह और भी है, एक जगह और भी हैयह गांव मे हो नही है, जीवन मे एक जगह औंर है-इसके लिए धीरे-धीरे यह मंदिर रोज आपका याद दिलाता है । अरि ऐसे क्षण हे जब बाजार से भी आप ऊब जाते है । और ऐसे क्षण है जब घर से भी ऊब जाते है । तब मंदिर का द्वार खुला है । ऐसे क्षण मे तत्काल आप मंदिर मे सरक जाते है मंदिर सदा तैयार है।

जहा मंदिर गिर गया वहा फिर बडी कठिनाई है, विकल्प नही है । घर से ऊब जाए तो होटल हो सकता है, रेस्तरा हो सकता है । बाजार से ऊब जाए । पर जाए कहा ? कोई अलग डाइमेन्शन, कोई अलग आयाम नही है । बस वही है, वही के वही घूमते रहते है ।

मंदिर एक बिलकुल अलग डाइमेन्शन है जहा लेनदेन की दुनिया नहीं है । इसलिए जिन्होने मंदिर को लेन-देन की दुनिया बनाया, उन्होने मंदिर को गिराया । जिन्होने मंदिर को बाजार बनाया, उन्होने मंदिर को नष्ट किया । जिन्होने मंदिर को भी दुकान बना लिया, उन्होंने मंदिर को नष्ट कर दिया । मंदिर लेन-देन की दुनिया नही है । सिर्फ एक विश्राम हैं।एक विराम है, जहा आप सब तरफ से थके मादे चुपचाप वहा सिर छिपा सकते है।

और वहा की कोई शर्त नही हें कि आप इस शर्त पर आओ-कि इतना धन हो तो आओ कि इतना ज्ञान हो तो आओ, कि इतनी प्रतिष्ठा हो तो आभा, कि ऐसे कपडे पहन कर आओ, कि मत आओ । वहा की कोई शर्त नहीं है । आप जैसे हो मंदिर आपको स्वीकार कर लेगा । कही कोई जगह हे, जैसे आप हा वैसे ही आप स्वीकृत हो जाओगे, ऐसा भी शरण-स्थल है ।

और आपकी जिदगी मे हर वक़्त ऐसे मौके आएगे जब कि जा जिदगी है तथाकथित, उससे आप ऊबे होगे, उस क्षण प्रार्थना का दरवाजा खुला है । और एक दफे भी वह दरवाजा आपके भीतर भी खुल जाए तो फिर दुकान मे भी खुला रहेगा मकान मे भी खुला रहेगा । वह तत्काल निरंतर पास होना चाहिए, जब आप चाहो वहा पहुच सकी । क्योकि आपके बीच जिसको हम विराट का क्षण कहे वह बहुत अल्प है कभी क्षण भर को होता है जरूरी नही कि आप तीर्थ जा सको जरूरी नहीं कि महावीर को खोज सकी, कि बुद्ध को खोज सकें। वह इतना अल्प है, उस क्षण बिलकुल निकटतम आपके कोई जगह होनी चाहिए जहा आप प्रवेश कर सकें ।

 

अनुक्रम

1

मंदिर के आंतरिक अर्थ

9

2

तीर्थ: परम की गुह्या यात्रा

39

3

तिलक-टीके: तृतीय नेत्र की अभिव्यंजना

77

4

मूर्ति-पूजा: मूर्त से अमूर्त की और

107

 

गहरे पानी पैठ: Penetrating Deep Waters

Deal 20% Off
Item Code:
HAA378
Cover:
Hardcover
Edition:
2013
ISBN:
9788172612467
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 6.0 inch
Pages:
151 (1 B/W illustrations)
Other Details:
Weight of the Book: 350 gms
Price:
$23.50
Discounted:
$18.80   Shipping Free
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गहरे पानी पैठ: Penetrating Deep Waters
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पुस्तक के विषय में

तीर्थ है, मंदिर है, उनका सारा का सारा विज्ञान है । और उस पूरे विज्ञान की अपनी सूत्रबद्ध प्रक्रिया है । एक कदम उठाने से दूसरा कदम उठता है, दूसरा उठाने से तीसरा उठता है, तीसरा से चौथा उठता है, और परिणाम होता है । एक भी कदम बीच में खो जाए एक भी सूत्र बीच में खो जाए तो परिणाम नहीं होता ।

जिन गुप्त तीर्थों की मैं बात कर रहा हूं उनके द्वार हैं, उन तक पहुंचने की व्यवस्थाएं हैं, लेकिन उन सबके आंतरिक सूत्र हैं । इन तीर्थों में ऐसा सारा इंतजाम है कि जिनका उपयोग करके चेतना गतिमान हो सके ।

पुस्तक के अन्य विषय-बिंदु :-

मंदिर के आंतरिक अर्थ

तीर्थ : परम की गुह्य यात्रा

तिलक-टीके : तृतीय नेत्र की अभिव्यंजना

मूर्ति-पूजा : मूर्त से अमूर्त की ओर

एक तो होता है कि हम नाव में पतवार लगा कर और नाव को खेवें; दूसरा यह होता है कि हम पतवार तो चलाएं ही न, नाव के पाल खोल दें और उचित समय पर और उचित हवा की दिशा में नाव को बहने दें । तो तीर्थ वैसी जगह थी जहां से कि चेतना की एक धारा अपने आप प्रवाहित हो रही है, जिसको प्रवाहित करने के लिए सदियों ने मेहनत की है । आप सिर्फ उस धारा में खड़े हो जाएं तो आपकी चेतना का पाल तन जाए और आप एक यात्रा पर निकल जाएं । जितनी मेहनत आपको अकेले में करनी पड़े, उससे बहुत अल्प मेहनत में यात्रा संभव हो सकती है ।

हमारी यह सदी बहुत अर्थों में कई तरह की मूढ़ताओं की सदी है । और हमारी मूढ़ता का जो सबसे बड़ा आधार है वह निषेध है । पूरी सदी कुछ भी इनकार किए चली जाती है । और दूसरे भी सिद्ध नहीं कर पाते, तब फिर वे भी निषेध की धारा में खड़े हो जाते हैं । लेकिन ध्यान रहे, जितना निषेधात्मक होगा जीवन, उतना ही क्षुद्र हो जाएगा । क्योंकि इस जगत का कोई भी सत्य विधेयक हुए बिना उपलब्ध नहीं होता है । जितना निषेधात्मक होगा जीवन, उतना बुद्धिमान भला दिखाई पड़े, भीतर बहुत बुद्धिहीन हो जाएगा । जितना निषेधात्मक होगा जीवन, उतनी ही सत्य की, सौंदर्य की, आनंद की किसी अनुभूति की किरण भी नहीं उतरेगी । क्योंकि कोई भी महत्तर अनुभव विधायक चित्त में अवतरित होता है । निषेधात्मक चित्त में कोई भी महत्वपूर्ण अनुभव अवतरित नहीं होता ।...

जो हृदय इस पूरे जीवन को हा कहने के लिए तैयार हो जाए वह आस्तिक है । आस्तिकता का अर्थ ईश्वर को हा कहना नहीं, हा कहने की क्षमता है । नास्तिक का अर्थ ईश्वर को इनकार करना नहीं, नास्तिक का अर्थ न के अतिरिक्त किसी भी क्षमता का न होना है ।

प्रवेश से पूर्व

जैंसे हाथ में चाबी हो, चाबी को हम कुछ भी सीधा जानने का उपाय करे, चाबी से ही चाबी को समझना चाहे, तो कोई कल्पना भी नहीं कर सकता-उस चाबी की खोज-बीन से-कि कोई बडा खजाना उससे हाथ लग सकता है चाबी में ऐसी कोई भी सूचना नही है जिससे छिपे हुए खजाने का पता लगे । चाबी अपने में बिलकुल बंद है । चाबी को हम तोड़े- फोडें, काटे-लोहा हाथ लगे, और धातुएं हाथ लगजाएं-उस खजाने की कोई खबर हाथ न लगेगी, जो चाबी से मिल सकता है।

मंदिर है । पृथ्वी पर ऐसी एक भी जाति नही है जिसने मंदिर जैसी कोई चीज निर्मित न की हो । वह उसे मस्जिद कहती हो, चर्च कहती हो, गुरुद्वारा कहती हो, इससे बहुत प्रयोजन नहीं है । पृथ्वी पर ऐसी एक भी जाति नही है जिसने मंदिर जैसी कोई चीज निर्मित न कीं हो और आज तो यह संभव है कि हम एक-दूसरी जातियों से सीख ले एक वक्त था, जब दूसरी जातियां है भी, यह भी हमें पता नहीं था । तो मंदिर कोई ऐसी चीज नही है, जो बाहर से किन्ही कल्पना करने वाले लोगो ने खडी कर ली हो । मनुष्य की चेतना से ही निकली हुई कोई चीज है कितने ही टूर, कितने ही एकांत में, पर्वत में पहाड़ में, झील पर बसा हुआ मनुष्य हो, उसने मंदिर जैसा कुछ जरूर निर्मित किया है । तो मनुष्य की चेतना से ही कुछ निकल रहा है अनुकरण नहीं है, एक-दूसरे को देख कर कुछ निर्मित नही हो गया है इसलिए विभिन्न तरह के मंदिर बने, लेकिन मंदिर बने है बहुत फर्क है एक मस्जिद में और एक मंदिर में उनकी व्यवस्था में बहुत फर्क है उनकी योजना में बहुत फर्क है । लेकिन आकांक्षा में फर्क नहीं है, अभीप्सा में फर्क नहीं है ।

पहले तो मंदिर को बनाने की जो जागतिक कल्पना है समस्त जगत में, सिर्फ मनुष्य है जो मंदिर बनाता है । घर तो पशु भी बनाते है, घोसले तो पक्षी भी बनाते है, लेकिन मंदिर नहीं बनाते मनुष्य की जो भेद-रेखा खीची जाए पशुओं से, उसमें यह भी लिखना ही पडेगा कि वह मंदिर बनाने वाला प्राणी है । कोई दूसरा मंदिर नही बनाता । अपने लिए आवास तो बिलकुल ही स्वाभाविक है । अपने रहने की जगह तो कोई भी बनाता है । छोटे-छोटे कीड़े भी बनाते है, पक्षी भी बनाते है, पशु भी बनाते है । लेकिन परमात्मा के लिए आवास मनुष्य का जागतिक लक्षण है । परमात्मा के लिए भी आवास, उसके लिए भी कोई जगह बनाना । परमात्मा के गहन बोध के अतिरिक्त मंदिर नहीं बनाया जा सकता । फिर परमात्मा का गहन बोध भी खो जाए तो मंदिर बचा रहेगा, लेकिन बनाया नहीं जा सकता बिना बोध के । आपने एक अतिथि-गृह बनाया घर में, वह अतिथि आते रहे होगे तभी । अतिथि न आते हो तो आप अतिथि-गृह नहीं बनाने वाले है । हालाकि यह हो सकता है कि अब अतिथि न आते हो तो अतिथि-गृह खडा रह जाए ।

भारत पुन कभी भारत नही हो सकता जब तक उसका मंदिर जीवंत न हो जाए-कभी पुन भारत नहीं हो सकता । उसकी सारी कीमिया सारी अल्केमी ही मंदिर में थी जहा से उसने सबकुछ लिया था । चाहे बीमार हुआ हो तो मंदिर भाग कर गया था, चाहे दुखी हुआ हो तो मंदिर भाग कर गया था, चाहे सुखी हुआ हो तो मंदिर धन्यवाद देने गया था । घर में खुशी आई हो तो मंदिर मे प्रसाद चढा आया था, घर मे तकलीफ आई हो तो मंदिर में निवेदन कर आया था । सब-कुछ उसका मंदिर था । सारी आशाएं सारी आकांक्षाएं सारी अभीप्साए उसके मंदिर के आस-पास थी । खुद कितना ही दीन रहा हो, मंदिर को उसने सोने और हीरे-जवाहरातों से सजा रखा था ।

आज दाब हम सिर्फ सोचने बैठते है तो यह बिलकुल पागलपन मालूम पडता है कि आदमी भूखा मर रहा है-यह मंदिर को हटाओ, एक अस्पताल बना दो । एक स्कूल खोल दो । इसमे शरणार्थी ही ठहरा दो । इस मंदिर का कुछ उपयोग कर लो। क्योंकि मंदिर का उपयोग हमें पता नही है, इसलिए वह बिलकुल निरुपयोगी मालूम हो रहा है, उसमे कुछ भी तो नही है । अरि मंदिर में क्या जरूरत है सोने की, और मंदिर में क्या जरूरत है हीरो की, जब कि लोग भूखे मर रहे है ।

लेकिन भूखे मरने वाले लोगो ने ही मंदिर मे हीरा और सोना बहुत दिन से लगा रखा था । उसके कुछ कारण थे । जो भी उनके पास श्रेष्ठ था वह मंदिर मे रख आए थे क्योकि जो भी उन्होने श्रेष्ठ जाना था वह मंदिर से ही जाना था । इसके उत्तर मे उनके पास कुछ देने को नही था । न सोना कुछ उत्तर था, न हीरे कोई उत्तर थे । लेकिन जो मिला था मंदिर से, उसका हम कुछ और भी तो वहा नही दे सकते थे वहा कुछ धन्यवाद देने को भी नहीं था । तो जो भी था वह हम वहा रख आए थे अकारण नही था वह । लाखो साल तक अकारण कुछ नहीं चलता । इस मंदिर के बाहर ये तो उसके आविष्ट रूप के अदृश्य परिणाम थे, जो चौबीस घटे तरगायित होते रहत थे । उसके चेतन परिणाम भी थे । उसके चेतन परिणाम बहुत सीधे-साफ थे ।

आदमी को निरंतर विस्मरण है । वह सब जो महान है विस्मृत हो जाता है, और जा सब क्षुद्र है, चौबीस घटे याद आता है । परमात्मा को याद रखना पडता है, वासना को याद रखना नही पडता, वह याद आती है । गढ़डे मे उतर जाने में कोई कठिनाई नही होती, पहाड़ चढने मे कठिनाई होती है । तो मंदिर गांव के बीच मे निर्मित करते थे कि दिन मे दस बार आते-जाते मंदिर किसी और एक आकांक्षा को भी जगाए रखे।...

यह आपके लिए चौबीस घटे आकांक्षा का एक नया स्रोत बना रहता है ।

एक और द्वार भी है जीवन मे दुकान और घर ही नहीं, धन और स्त्री ही नही-एक और द्वार भी है जीवन मे जो न बाजार का हिस्सा है, न वासना का हिस्सा हे, न धन मिलता है वह।, न यश मिलता है वहा, न काम-तृप्ति होती है वहा । एक जगह और भी है, एक जगह और भी हैयह गांव मे हो नही है, जीवन मे एक जगह औंर है-इसके लिए धीरे-धीरे यह मंदिर रोज आपका याद दिलाता है । अरि ऐसे क्षण हे जब बाजार से भी आप ऊब जाते है । और ऐसे क्षण है जब घर से भी ऊब जाते है । तब मंदिर का द्वार खुला है । ऐसे क्षण मे तत्काल आप मंदिर मे सरक जाते है मंदिर सदा तैयार है।

जहा मंदिर गिर गया वहा फिर बडी कठिनाई है, विकल्प नही है । घर से ऊब जाए तो होटल हो सकता है, रेस्तरा हो सकता है । बाजार से ऊब जाए । पर जाए कहा ? कोई अलग डाइमेन्शन, कोई अलग आयाम नही है । बस वही है, वही के वही घूमते रहते है ।

मंदिर एक बिलकुल अलग डाइमेन्शन है जहा लेनदेन की दुनिया नहीं है । इसलिए जिन्होने मंदिर को लेन-देन की दुनिया बनाया, उन्होने मंदिर को गिराया । जिन्होने मंदिर को बाजार बनाया, उन्होने मंदिर को नष्ट किया । जिन्होने मंदिर को भी दुकान बना लिया, उन्होंने मंदिर को नष्ट कर दिया । मंदिर लेन-देन की दुनिया नही है । सिर्फ एक विश्राम हैं।एक विराम है, जहा आप सब तरफ से थके मादे चुपचाप वहा सिर छिपा सकते है।

और वहा की कोई शर्त नही हें कि आप इस शर्त पर आओ-कि इतना धन हो तो आओ कि इतना ज्ञान हो तो आओ, कि इतनी प्रतिष्ठा हो तो आभा, कि ऐसे कपडे पहन कर आओ, कि मत आओ । वहा की कोई शर्त नहीं है । आप जैसे हो मंदिर आपको स्वीकार कर लेगा । कही कोई जगह हे, जैसे आप हा वैसे ही आप स्वीकृत हो जाओगे, ऐसा भी शरण-स्थल है ।

और आपकी जिदगी मे हर वक़्त ऐसे मौके आएगे जब कि जा जिदगी है तथाकथित, उससे आप ऊबे होगे, उस क्षण प्रार्थना का दरवाजा खुला है । और एक दफे भी वह दरवाजा आपके भीतर भी खुल जाए तो फिर दुकान मे भी खुला रहेगा मकान मे भी खुला रहेगा । वह तत्काल निरंतर पास होना चाहिए, जब आप चाहो वहा पहुच सकी । क्योकि आपके बीच जिसको हम विराट का क्षण कहे वह बहुत अल्प है कभी क्षण भर को होता है जरूरी नही कि आप तीर्थ जा सको जरूरी नहीं कि महावीर को खोज सकी, कि बुद्ध को खोज सकें। वह इतना अल्प है, उस क्षण बिलकुल निकटतम आपके कोई जगह होनी चाहिए जहा आप प्रवेश कर सकें ।

 

अनुक्रम

1

मंदिर के आंतरिक अर्थ

9

2

तीर्थ: परम की गुह्या यात्रा

39

3

तिलक-टीके: तृतीय नेत्र की अभिव्यंजना

77

4

मूर्ति-पूजा: मूर्त से अमूर्त की और

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Kiran, USA
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Smitha, USA
Over the years, I have purchased several statues, wooden, bronze and brass, from Exotic India. The artists have shown exquisite attention to details. These deities are truly awe-inspiring. I have been very pleased with the purchases.
Heramba, USA
The Green Tara that I ordered on 10/12 arrived today.  I am very pleased with it.
William USA
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